घोघा बापा का प्रेत (कहानी) -14, (घाटी का छापामार युद्ध)

घोघाबापा का प्रेतघोघा बापा का प्रेत (कहानी) -14
(घाटी का छापामार युद्ध)


कहानी का पिछला भाग – घोघा बापा का प्रेत (कहानी) -13

वन में अग्निदहन से जो कुछ खाद्य सामग्री इत्यादि बच गई थी, उसको बचाने की कोशिश करते हुए डरी सहमी यवन सेना ने मैदान में पड़ाव डाला। इतने में सूर्योदय हो ही चुका था, घायलों का उपचार इत्यादि शुरू कर दिया गया। महमूद पहले से ही घायल था, अग्निकाण्ड का और बुरा प्रभाव हुआ। सेना का मनोबल वापस लाने के पहले उसको स्वयं ठीक होना जरुरी था। उसने सारे सिपाहसालारों सहित मसूद को आदेश दे दिया कि जैसे ही गुप्तचर कोई सुरक्षित रास्ता ढूंढ लें, मुझे तुरंत समाचार मिलना चाहिए तथा कैसे भी करके सेना का मनोबल और उत्साह बढ़ाने के उपाय किये जायँ।

परन्तु जो भी गुप्तचर लौट कर आ पाया उसने यही बताया कि अभी शीघ्रता के लिए घाटी से होकर जाना ही सर्वोत्तम है। सेना बहुत बड़ी है, अगर हम पहाड़ियों के पीछे से निकले तो एक पखवाड़े का समय लग सकता है, तथा आसान और समतल रास्ते वह भी नहीं होंगे।

महमूद ने सेना में ढिंढोरा पिटवा दिया कि यह आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है। इसलिए केवल आज की रात यहाँ पर हम लोग रुकेंगे, तथा कल प्रातः ही हम घाटी में प्रवेश करेंगे। जितना शीघ्र हो सके, घाटी से निकल कर ही विश्राम किया जाना उचित रहेगा। अतः आज की रात सबलोग पर्याप्त मशालें जलाकर चौकन्ने रहें।
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इधर सामन्त ने अपनी प्रेतसेना को भी योजनानुसार तीन टुकड़ियों में विभक्त किया। पहली और दूसरी टुकड़ी दोनों पहाड़ियों के सघन वन में, तीरों और पत्थरों के साथ छुप कर तैयार बैठी थी। तीसरी टुकड़ी में सामन्त और आचार्य विष्णुदत्त स्वयं थे। इस टुकड़ी का कार्य अत्यंत ही दुस्साहस भरा होना था। निर्णय यह हुआ था कि समूची यवन सेना के घाटी में उतर जाने के बाद ही आक्रमण किया जाय ताकि सुल्तान और खजाना दोनों ही न बच सकें। अतः तीसरी टुकड़ी, बिना किसी शोर के, वन में खुद को यत्नपूर्वक छिपाते हुए यवन सेना के घाटी में उतर जाने की प्रतीक्षा करने लगी।

अगले दिन महमूद को जैसे खतरे का आभास हो गया। उसने अलसुबह के अँधेरे में ही सेना को कूच करने का आदेश दे दिया। अनुमानतः यह बीस से पच्चीस कदम चौड़ी घाटी थी, जो कहीं अधिक चौड़ी थी, तो कहीं थोड़ी संकरी हो जाती थी। महमूद ने ठीक वैसी ही योजना बनाई कि सेना के पहले हिस्से में वो अपने अंगरक्षकों के साथ उनके मध्य चलेगा, दूसरे में सेना के पैदल सैनिक होंगे और तीसरे तथा पीछे वाले हिस्से में खजाने रहेंगे, पालकियों के साथ। सारी यवन सेना एक विशालकाय अजगर की भांति, शनैः शनैः उस घाटी में प्रवेश कर गई। यह देख कर, यवन सेना के पीछे वन में छिपे खड़े आचार्य विष्णुदत्त ने अपनी कमर में बांधा हुआ विशालकाय ‘रूद्र शंख’ निकाल कर उसको फूंक दिया। उस शंख के गर्जन ने मानो दिशाएं गुंजित कर दीं। उस शंख की आवाज महमूद के कानों तक भी पहुंची। वो तत्क्षण समझ गया कि उसकी सेना, बहुत ही चतुराई से इस संकरी घाटी में घेर ली गई है। परन्तु उसने भी एक चातुर्य कर रखा था, जो किसी को भान ही नहीं हो सका।

सबको यही पता था कि महमूद अपने श्रेष्ठ सिपहसालारों के साथ, सेना के बीच में हाथियों पर रखी पालकियों में बैठा हुआ है, जबकि ऐसा था नहीं। वो साधारण सैनिकों के भेष में अपने सिपहसालारों के साथ, तेज चपल घोड़ों पर सबसे आगे-आगे चल रहा था। जैसे ही उसने शंख का भीषण जयघोष सुना, उसने तुरंत ही ऊपर पहाड़ियों पर तीक्ष्ण दृष्टि डाली। उसकी दृष्टि से पहाड़ियों पर चींटियों की तरह छुप कर रेंगते प्रेत सैनिक बच नहीं सके। महमूद इस व्यवस्था को देखते ही काँप उठा, और अपनी सेना को शीघ्रता का आदेश देते हुए, उस घुटने तक जल वाली नदी में अपना घोड़ा कुदा दिया।

क्षण भर में ही ऊपर से तीरों और पत्थरों की वर्षा आरम्भ हो गई। सम्पूर्ण यवन सेना में भगदड़ मच गई। परन्तु भागने और बचने का केवल एक ही रास्ता दिख रहा था, और वो था आगे की ओर बढ़ना। अगल-बगल दोनों ओर तो अगम पहाड़ियां थीं, और शंखनाद पीछे से ही हुआ था तो निश्चित ही केवल आगे बढ़ना ही जीवित बच निकलने का रास्ता था। सम्पूर्ण यवन सेना अपनी जान की बाजी लगाकर अपने ही सैनिकों, घोड़ों, हाथियों के ऊपर से होकर, यथाशीघ्र सामने के विशाल मैदान में पहुँच जाना चाहती थी। कितने इसी भगदड़ में अपनों द्वारा ही कुचल कर मारे गए। अधिकांश जो बच रहे थे, वो ऊपर से तीर और पत्थरों की वर्षा से काल कवलित हुए जा रहे थे। पत्थरों की वर्षा से बचना तो तुलनात्मक रूप से आसान था, परन्तु तीरों की वर्षा बड़ी भयानक थी। पहले से घायल महमूद को पुनः कुछ तीर पीछे से लगे, लेकिन उसका ताकतवर घोड़ा इस बार महमूद को हवा की गति से उस घाटी से निकाल ले गया।

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मनुष्य हो या पशु, सर्वाधिक भय तभी लगता है जब वो अपने हमलावर के विरुद्ध कुछ कर न सकें। अगर प्रत्युत्तर दिया जा सके, तो भय कम होने लगता है। यहाँ यवन सेना का यही हाल था। उनको दुश्मन नजर ही नहीं आ रहा था। अतः उनको सिर्फ शीघ्रातिशीघ्र भाग कर ही जान बचाना एक ठीक उपाय लगा।
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