घोघा बापा का प्रेत (कहानी) -15 (अमेजन योद्धा)

घोघाबापा का प्रेतघोघा बापा का प्रेत (कहानी) -15

(अमेजन योद्धा)

कहानी का पिछला भाग – घोघा बापा का प्रेत (कहानी) -14, (घाटी का छापामार युद्ध)

_______________________________

सामन्त अपनी जगह खड़े-खड़े उस युवती को निर्निमेष, एकटक देख रहा था। उसकी भौहें कमान की तरह तनी हुई हैं। उसकी सीप सी पलकों में आँखों की पुतलियाँ पर्याप्त बड़ी हैं। ऐसा लग रहा है कि जिसकी ओर भी वो देख ले, तो उसकी चितवन सीधा ह्रदय में उतर कर उसको छिद्रित करते हुए पार उतर जाएगी। सुनहले बालों की कुछ लटें, पहाड़ी हवा के संसर्ग में आकर चंचल हो गई हैं, और अब उसके चेहरे से अठखेलियाँ कर रही हैं। होंठ गहरे गुलाबी, पतले हैं। सामन्त को लगा कि संभवतः ये पहले भरे-भरे रहे होंगे, क्योंकि एक योद्धा के होंठ, युद्ध के क्रोध में भिंचते-भिंचते धीरे-धीरे पतले ही लगने लगते हैं।

चेहरा बेदाग गोरा और रंग तो ऐसा जैसे दूध में गुलाब घोल दिया गया हो। गालों की त्वचा इतनी मुलायम कि जैसे उसपर मोरपंख फिराने से भी खरोंच लग जायेगी। कटि प्रदेश में नाभि से नीचे साड़ी जैसा कोई वस्त्र पहनी है, जो पीछे से भारतीय कोंकणी तरीके से पीछे खोंसी गई थी, परन्तु अब खुल कर उत्तर भारतीय परिधान साड़ी बन गया था। जिससे उसकी खूबसूरती और भी बढ़ गई थी। श्वेत रंग के परिधान में किनारों पर कुछ कढ़ाई का काम भी प्रतीत हो रहा था।

सामन्त सोच रहा था कि आखिर इसने भारतीय परिधान क्यों पहना हुआ है? वैसे इससे सुन्दर स्त्री उसने आजतक किसी को नहीं देखा है। संभवतः यह संसार की सबसे खुबसूरत युवती है। किसी रूपसी अप्सरा जैसी जो सीधा स्वर्ग से उतर कर यहाँ इस शिला पर बैठ गई हो, और अब आकाश को देख रही थी, अपलक।

अभी इतना भीषण द्वन्द युद्ध हुआ है, और उसका शत्रु सामन्त, उसके सामने अभी भी उसके ही सैनिकों के रक्त से रंजित तलवार लिए खड़ा है। और यह इतनी निश्चिन्तता से शांत बैठ गई है? इतनी शांत और पत्थर की मूर्ति जैसे स्थिर, कि मानो जैसे ऊपर वाले ने अपनी अनुपम कृति की रचना भरपूर समय लगाकर किया हो, अंग-प्रत्यंग को ब्रह्माण्ड के सबसे उच्च सांचे में ढाल कर बनाया हो और अंत में उसमें प्राण फूंकना भूल गया हो।

सामन्त सोच रहा था कि इतनी भोली सी अप्सरा जैसी दिखने वाली यह रूपसी युवती, क्या सच में वही है जो अभी इतनी प्रचंड गति से तलवार चला रही थी। कहीं रूप के जाल में फंसाने की कोई विषकन्या जैसी चाल तो नहीं?
यह विचार आते ही सामन्त फिर से कठोर हो गया।
_______________________________

तभी फिर से जैसे कोयल कुहकी हो, “सामन्त, तुम कुछ बोलते नहीं कभी? मैं तुम्हारे हर प्रश्न का, सत्य उत्तर दूंगी, जितना भी मुझे ज्ञात है, जो चाहे पूछ लो। जानती हूँ कि फिर भी मुझपर भरोसा नहीं करोगे।“

सामन्त चुप ही रहा, वो सोच रहा था कि, “ये कौन है? इतनी शुद्ध हिंदी कैसे जानती है? मेरे बारे में कैसे जानती है?”

“अच्छा, तुम स्वयं कहो, कहाँ से प्रारंभ करूँ?” वो पुनः बोली।

“प्रारम्भ से ही प्रारम्भ होना उचित होता है। पर क्या तुम्हारी आँखें सत्य ही नीलाभ हैं?“ सामन्त बोल ही उठा।

“सत्य कहा, प्रारम्भ से ही उचित रहेगा। हाँ मैं ग्रीक देश से हूँ, जहाँ अधिकतर लोगों की आँखें जन्म से ही नीलाभ होती हैं। काली भी होती हैं, और भूरी भी। लेकिन मैं इनको बदल भी लेती हूँ, यथा परिस्थिति, क्योंकि मैं कूटकन्या हूँ। विषकन्या एक अनुचित शब्द है जिसका लोगों ने ‘कूट’ का सही अर्थ न समझने से अनर्थ कर रखा है। तुम मुझे एक प्रकार से गुप्तचर भी कह सकते हो, जिसका कार्य महमूद की हर इच्छा को सफलतापूर्वक फलीभूत करने के लिए योजनायें बनाना है। मैं यहाँ भारत में तीन वर्ष से आती-जाती रही हूँ, सोमनाथ विजय की योजना बनाने के लिए।”

सामन्त ने कठोर मुद्रा में कहा, “ओह, तो महमूद के पापी कार्य की मुख्य सहयोगी हो तुम? तुम्हें तो मुझे समाप्त ही करना होगा।”

वो खिलखिलाई, और इतनी जोर से कि लगा जैसे दूर कहीं किसी मंदिर की सारी घंटियाँ मधुर स्वर में एक साथ बज गई हों, बिलकुल उन्मुक्त हँसी। उसके दांतों की धवल पंक्ति, घने मेघ में तड़ित की भांति चमक गई। हँस लेने के उपरांत बोली, “अभी इतनी भी शीघ्रता न करो मेरे प्रिय, सर्वप्रथम मुझसे सारी सूचनाएँ तो ले लो, अन्यथा तुम्हारा ही नुकसान होगा।” फिर वो गहरी सांस भर कर वो बोली, “और उसके बाद मैं खुद को ही समर्पित कर दूंगी, चाहे मारो, काटो या जो मन में आये करो। मैं स्वयं इस जीवन से ऊब चुकी हूँ अब।”

सामन्त उसकी बात सुनकर सोचा, “कह तो यह उचित ही रही है, पहले सारी सूचना तो जान ली जाए” और फिर सामन्त उसके ठीक सामने एक छोटे पत्थर पर बैठ गया। तलवारें अभी भी हाथों में ही थीं जमीन पर टिकी हुईं।

वो आगे बोली, “तुम पाप की बात कर रहे हो? मैं चौबीस साल के अपने जीवनकाल में संसार की हर उपलब्ध पुस्तक पढ़ चुकी हूँ। हाँ और अब अंत में, तुम्हारे रामायण, महाभारत, वेद, पूराण इत्यादि हाथ लगे। तुम्हें बता दूँ कि इनको पढने के बाद तुम्हारे ‘प्रभु श्रीराम’ की अनन्य भक्त हो चुकी हूँ। आश्चर्य होता है मुझे रामायण पढ़ कर कि क्या कोई इतना भी मर्यादा पुरुषोत्तम व्यक्ति इस धरा पर हो सकता है? तभी तो कहती हूँ कि अब लगता है कि मैं व्यर्थ जी रही हूँ।“

“सामन्त, पाप और पुण्य हर देश, काल, परिस्थिति में परिवर्तित होते रहते हैं। तुम किन पापों की बात कर रहे हो? महमूद के जिन कार्यों को तुम पाप बता रहे हो, उसका भगवान् उन्हीं कार्यों को ‘एक मोमिन के लिए जन्नत का रास्ता’ बताता है। तुम भारत भूमि पर पैदा हुए, इसलिए तुम्हें यह सब पाप लग रहा है। और अब तुम्हारे ग्रंथों के पढने के बाद, तुमसे परिचित होने के बाद,.. मुझे भी पाप लग रहा है। परन्तु यदि ऐसा न हुआ होता तो? तुम महमूद के पुत्र बनकर पैदा होते तो? तब तुम किसे पाप बोलते? बोलो?”

Loading...

सामन्त सिर झुका कर तलवार से मिटटी खुरेदने लगा। थोड़ी देर पश्चात् बोला, “तो निर्दोषों को मारना तुम्हारे हिसाब से पुण्य का कार्य है?”
____________________________________

NEXT कर अगले पेज पर शेष कहानी पढ़ें

Follow us on facebook -