फ्लू का खतरा व देशी बचाव

भादवै का घाम

 फ्लू का खतरा व देशी बचाव

 फ्लू का खतरा व देशी बचाव

सब पढ़णियां नै गुगा नोमी कि राम राम, आज के दिन जाडा डूमां कै घरां लठोळी टेक जाया करै। डूम कौण?? डूम ओ जो कोए काम धंधा ना करे अर कतिए ठाली रवै, मेरी ढाळ

 

आज कै दिन घर म्हं बचे पूड़े गुलगुले, स्यवाळी आदि तैलीय खाणा बंद कर दिया जाता था और Fight with Sun of भादवा, यानि भादवै के घाम से बचाव शुरु हो जाता है।

 फ्लू का खतरा व देशी बचावभारतीय रहन सहन के बारे में हमें ज्ञान भारतीय ग्रामीण आंचल में प्रचलित कहावतों से ही मिलता है, क्योंकि आजादी से पहले मुगल उस ज्ञान को इतना नहीं मिटा पाए जितना अंग्रेजों ने अपना साम्राज्य व व्यापार फैलाने के लिए मिटाया। आजादी के बाद हम काले अंग्रेजों ने विकास करने के नाम पर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। हमने अपनी मानसिक गुलामी के कारण अपने शताब्दियों से चले आ रहे प्रमाणिक व परम्परागत ज्ञान को ही दोयम दर्जे का समझ लिया और इस में हमारे संवैधानिक संस्थानों व शिक्षा प्रणाली का भी बराबर का योगदान रहा। आजादी के बाद आजतक किसी भी प्राचीन विद्या पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया अतः खानपान से लेकर रहन सहन तक भारतीय मुल्य व विज्ञान दम तोडते गये।

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किसी भी राष्ट्र का सबसे बड़ा धन होता है उस के स्वस्थ नागरिक और मानव स्वास्थय सीधा सीधा जलवायु से जुड़ा हुआ है। इसी भारतीय जलवायु का एक महीना है भादवा और कदे तैं कहंदे आए अक् भादवै का  घाम अर साझै का काम बढे बढ्या नै तोड़ दे तैं  इन से बच कै रहणा चाहिए, यो भादवै का घाम अर साझै का काम सेद ज्या सै।

 फ्लू का खतरा व देशी बचाव

क्या है भादवै की धूप?? यह हमें क्यों बीमार करती है?? इस से पहले कैसे बचते थे और अब कैसे बचें???

 

आषाढ़ व सामण में राम जी कई बार बरस लिए होते हैं जिस से बैशाख व जेठ के महीने में थार के मरूस्थल से उठा कर आसमान में फैला गरदा साफ हो जाता है। यह गरदा उत्तर भारत के लिए प्रकृति का दिया वरदान है क्योंकि यह जेठ व आषाढ़ महीने के 45 से 48℃ के तापमान पर भी पराबैंगनी किरणों को धरती पर आणे से रोक देता है तथा हम उन से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। भादवा आते आते दिन का तापमान तो 36 से 38℃ के आसपास ही रहता है पर आसमान में वो गरदा नहीं होने तथा वातावरण में नमी के कारण हमें गर्मी जेठ के महीने से भी ज्यादा लगती है। जेठ के महीने में हवा में नमी नहीं होने के कारण जो पसीना आता है उसका तुरंत वाष्पीकरण हो जाता है वह हमारी त्वचा को ठण्डी कर देता है अतः जेठ आषाढ़ म्हं इतणी गर्मी कोन्या लागदी।

 

भादवै के महीने में जेठ से कम तापमान होने पर भी वायु म्हं नमी घणी होणे के कारण पसीना नहीं सूखता तथा इस पसीने के साथ हमारी देही से आवश्यक खनिज लवण निरंतर निकलते रहते हैं। कदे आपणै पसीने नै चाट कै देखिओ खारा ना लाग्गै तै। यह खारापण सोडियम व पोटैशियम जैसे तत्वों के अधिक मात्रा में निकलने से ही होता है। इन के निकलने व पराबैंगनी किरणों के प्रभाव से हमें रक्त विकार , त्वचा विकार व चक्कर आदि आणे व ताप आदि चढ़णे लगते हैं। खनिज पदार्थों के ज्यादा स्राव से माणस बेहोश भी हो सकता है तथा यह बहुत घातक हो सकता है।

 

तो के करया करदे म्हारे बुढ्डे???

 

इस मौसम में ही सोडियम, पोटैशियम व अन्य खनिजों की खान कोंधरा, चौळाई, लूणी, सांठी व भांखड़ी जैसे साग व औषधियां खेतों में भरपूर मात्रा में मिलती हैं, वो उनका रोजाना साग बणा कै खाया करदे जिस से इन तत्वों की देही म्हं कमी ए ना होया करदी।

 

नंबर दो वो कच्चे मकानों में छप्पर या काठ (कड़ी व शहतीर) कि छत डाल कर उन में रहा करदे जो कि उष्मा रोधी होते थे। ये मकान गोबर से लीपे होते थे जो कि पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेते थे तथा वायुमंडल से अतिरिक्त नमी को सोख कर गर्मी नहीं लगने देते थे।

 

आप क्या कर सकते हैं??

 

एक तो फ्रिज का पाणी पीणा अब बिलकुल बंद कर दें क्योंकि आप जब बाहर से आते हैं तो आपका शरीर गर्म होता है। घर में घुसते ही ठण्डा पाणी पीणे से सर्द गर्म होगा ही होगा, अंग्रेजी म्हं बोल्लूं तो (Flue) फ्लू , और ये विभिन्न प्रकार के ताप जो इन दिनों म्हं चढ़ते हैं ना ये भी इस फ्लू के कारण ही चढ़ते हैं।

 फ्लू का खतरा व देशी बचाव

दूसरा आपणे लिए फैमिली डॉक्टर की तरह अब एक फैमिली फार्मर भी रख लो जो इन दिनों म्हं कोंधरा, चौळाई, लूणी, सांठी व भांखड़ी आदि Herbs की स्पलाई कर दे तथा सर्दियों में बधूआ, गुड़, शक्कर, खांड, शीरा आदि लौह तत्व व अन्य आवश्यक खनिज तत्वों से भरपूर देशी खाणा व बिना यूरिया व पेस्टिसाईडस् का अनाज आप तक पहुंचा सके।

 

तीसरा घरों के अंदर की लीपाई, पुरे घर की संभव ना हो तो सोणे वाले कमरे की लीपाई तो मिट्टी, चूना, जिप्सम व देशी गाय के गोबर से कर ही लो। अगर लीपाई के झंझट से बचणा है तो वैदिक प्लास्टर मंगवा कर मिस्त्री से करा लो। माटी म्हं माटी बण कर रवोगे तै बीमारी घाट्य लोवै लागेंगी।

 

तीनों सरल उपाय है, जै स्वस्थ रहणा है तो ये उपाय करने ही पडैंगे ना तै मर्जी थारी। बीमार हो कै पीसे बर्बाद करने से बढिया है बीमार ही ना होणा।

 

आच्छा खाओ पीओ, आच्छी ढाळ रहो, यही है भारत यही है भारतीयता। इन्हीं शब्दों के साथ आज की आपणी राम राम। हां लूणी की अर वैदिक प्लास्टर क्युकर एक्टिवा पै धर कै लोग ले ज्यां सैं, देखणी मन्ना भुलियो☺👇👇

 

आपका आपणा अणपढ़ जाटः-

डॉ. शिवदर्शन मलिक।

वैदिक भवन, रोहतक (हरियाणा)

9812054982

www.vedicplaster.com

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