जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज के द्वारा एक भक्त के पूंछने पर  लिंग शब्द  की अद्भुत व्याख्या

(जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज के द्वारा एक भक्त के पूंछने पर  लिंग शब्द  की अद्भुत व्याख्या )

जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज के द्वारा एक भक्त के पूंछने पर  लिंग शब्द  की अद्भुत व्याख्या

प्रश्न- शिवलिंग में लिंग क्या है??

 

उत्तर- न्याय दर्शन में लिंग शब्द का प्रयोग ज्यादे होता है। लिंग का अर्थ होता है सिम्बल। अंग्रेजी में जिसको सिम्बल कहते हैं। चिह्न हिंदी में कहते हैं।

चिह्न शब्द भी संस्कृत का ही है।

जैसे- धुँए की अखण्ड धारा हो, उस धुएं को लिंग मानते हैं- सूचक, ज्ञापक , हेतु।

और अनुमान हित है कि यहां आग जरूर होगी। इसलिए धुँए की अखण्ड धारा को लिंग बोल देते हैं , उसके द्वारा अग्नि का  अनुमान होता है।

शिवलिंग की व्युत्पत्ति शास्त्रों में दो ढंग से की  गयी ।

भगवान जो ‘ शान्तं शिवमद्वैतम चतुर्थम मन्यन्ते सहात्मा सविज्ञेय:’ मांडूक्य उपनिषद का सातवां मंत्र है ।

निर्गुण निराकार सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा का नाम शिव है, उनका सूचक , अभिव्यंजक संस्थान होने के कारण  शिवलिंग को शिवलिंग कहा जाता है।

लेकिन उपनिषदों में शिव ही लिंग ऐसा अर्थ भी किया है।

शिव का सूचक लिंग और शिव ही लिंग रूप से व्यक्त हैं।

अरुणाचलम में ज्योतिर्लिंग इत्यादि की जो गाथा है भगवान शिव ही आने निर्गुण निराकार स्वरूप को लीला पूर्वक अमुक अमुक स्थल पर शिवलिंग के रूप में, लिंग के रूप में व्यक्त करते हैं।

इस प्रकार शिव और लिंग में कोई भेद नहीं ।

जिस प्रकार धाम और धामी में कोई भेद नहीं।

‘ यदि गत्वा न निवर्तन्ते ,तद्धाम परमं ममः।’

अब भगवान शिव अष्टमूर्ति हैं। निर्गुण निराकार जो भगवान का , शिव का स्वरूप है, उसी को द्योतित करने वाला शिव का लिंग होता है।

भगवान अष्टमूर्ति है और अष्टमुख हैं, आठों दिशा में उनका मुख होता है। दक्षिणामूर्ति भी भगवान शिव का एक स्वरूप है तो उस ढंग से दक्षिण दिशा की मुख वाला जो है, वह भी प्रशस्त है।

पंचभूत और उसी में अग्नि (तेज), सूर्य  और चंद्रमा को ले लेते हैं, तो आठ मुख भगवान के हो जाते हैं।

 

भगवान के त्वमर्क:, त्वमापः इस प्रकार से पुष्पदंत इत्यादि ने भगवान के स्वरूप का वर्णन किया है। भगवान शिव की अष्टमूर्तियाँ हैं। अष्टधा प्रकृति के रूप में भगवान स्वयम ही व्यक्त है।

पंच ज्ञानेन्द्रिय और मन, बुद्धि अहंकार के रूप में हमारे जीवन में भगवान व्यक्त हैं , इनका नाम शिवलिंग ही है।

श्रीमद्भागवत में आया है कि आध्यात्मिक धरातल पर ये शिवलिंग हैं।

श्रीमद्भागवत में कहा गया- ‘लक्षणै:, अनुमापकै: ‘।

जो कार्य होता है, वह करण का अनुमापक होता है। कार्य हो रहा है, करण( माध्यम) का अनुमान होता है और कर्ण के द्वारा कर्ता, करण के प्रयोक्ता का नाम कर्ता होता है। करण के द्वारा करता का अनुमान होता है

और करण निरपेक्ष, क्रिया निरपेक्ष कर्ता को क्या कहते हैं.. निष्क्रिय, निर्विकार।

इस प्रकार से बुद्धि इत्यादि जो करण हैं, ये भी शिवलिंग हैं, शिवस्वरूप आत्मा के अभिव्यंजक संस्थान हैं और इनके द्वारा आत्मतंत्र उपलक्षित होता है। इस प्रकार मैंने शिवलिंग की बात कही।

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लेखन कर्ता

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प्रशान्त कुमार मिश्र

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