क्या आदि शंकराचार्य जी मायावादी एवं प्रच्छन्न बौद्ध थे ?

क्या आदि शंकराचार्य जी मायावादी एवं प्रच्छन्न बौद्ध थे ?

शांकरमतस्थापनम्- आक्षेपकखंडनम्

द्वैतवादी आक्षेपक :-
यदि जगत मिथ्या है तो ब्रह्म कैसे और यदि ब्रह्म ही है तो मिथ्या कैसे ?

💐श्रीभागवतानंद गुरु💐 :-
यदिदं सकलं विश्वं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात् ।
तत् सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्ताशेष भावना दोषम् ।।
(विवेक चूड़ामणि 229)
यह सम्पूर्ण विश्व जो अज्ञान से नाना प्रकार का प्रतीत हो रहा है, समस्त भावनाओं के दोष से रहित (अर्थात्) निर्विकल्प ब्रह्म ही है।

द्वैत में यह समस्या है कि भगवान बड़ी परीक्षा लेते हैं। भक्त को संसार-परिवार और अपने मध्य कई भ्रामक स्थितियां देते हैं, जिससे वह उलझ जाता है। लेकिन अद्वैती तो संसार में भी ब्रह्म देख रहा है और स्वयं में भी और ब्रह्म में भी। वस्तुतः उसके लिए तो संसार, ब्रह्म और स्वयं में कोई भेद है ही नहीं। सर्वमिदं ब्रह्म। इसीलिए वह स्वयं से प्रेम करता है, और इस प्रकार से उसका प्रेम सबों के लिए होता है। उन सबों के लिए जिन्हें वह स्वयं से पृथक मानता ही नहीं। अद्वैत वाले उपासक नहीं होते। उपासक के लिए उपास्य की आवश्यकता है। और उपासक एवं उपास्य का भेद ही द्वैत है। अद्वैती तो निजोपास्योपासक होते हैं। जैसे हमारे स्वप्न में दृश्य और दर्शक एक ही होता है। दर्शक आत्मशक्ति से स्वयं को ही दृश्य के रूप में बना लेता है और फिर भी उसके दर्शक भाव में कोई परिवर्तन नहीं आता।

आत्मैवेदं जगत्तसर्वं आत्मनोऽन्यत् न विद्यते ।
मृदो यत्वत् घटाटीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते ।।
(आत्म बोध)
यह सम्पूर्ण जगत ही ब्रह्म है । आत्मा के अतिरिक्त कोई पदार्थ नहीं । यह आत्मज्ञानी विवेकी पुरुष को ही दिखता है । आत्मज्ञान के अतिरिक्त भौतिक दृष्टि वालों के लिए देहाश्रित वर्णाश्रम मर्यादा की स्थापना की गई है। किंतु आत्मज्ञानी के लिए वर्ण और देह की संज्ञाएँ महत्वहीन हो जाती हैं।

वर्णसम्मत व्यवस्था के अनुसार शूद्रों का वेदों में अनाधिकार है। किंतु मोक्षमूलक कर्मों में भी उनकी प्रवृत्ति योगमार्ग से सम्भव है। जो स्त्री शूद्रादि वेदादि में अनधिकृत हैं, उनके प्रति भी अद्वैती की समदर्शिता बनी रहती है।

वेदव्रतविहीनानां व्रात्यादीनां कृतागसाम्।
तथैवानुपवीतानां स्त्रीशूद्राणां भवेच्छिव॥
(गन्धर्व तंत्र, सप्तम पटल, ३८)
(स्त्री शूद्र और पतित व्रात्यों का उपनयन एवं वेद में अनधिकार)

प्रणवं वैदिकं चैव शूद्रे नोपदिशेच्छिवे।
(परमानन्द तंत्र, त्रयोदश उल्लास)

शूद्राणां वेदमंत्रेषु नाधिकार: कदाचन।
स्थाने वैदिकमंत्रस्य मूलमंत्रं विनिर्दिशेत्॥
(योगिनी तंत्र)
अद्वैती शब्दब्रह्म से ही इस जगत को ओतप्रोत मानते हैं और मूल समाज के पीछे भी इसी ऊर्जा को स्वीकार करते हैं।
शब्दब्रह्मेति शब्दावगम्यमर्थं विदुर्बुधा:।
स्वतोऽर्थानवबोधत्वात्प्रोक्तो नैतादृशो रवा:॥
(प्रपञ्चसारतंत्र, प्रथम पटल, ६२)

शब्दब्रह्म का तात्पर्य शब्द से प्रतीत होने वाला ‘अर्थ’ है, न कि केवल ध्वनि मात्र। बिन्द्वात्मक प्रकाशकत्व के बिना केवल ध्वनि, शब्द, या रव में अर्थ प्रकाशन की शक्ति नहीं होती।

परेण धाम्ना समनुप्रबुद्धा मनस्तदा सा तु महाप्रभावा,
यदा तु सङ्कल्पविकल्पकृत्या यदा पुनर्निश्चिनुते तदा सा।
स्याद्बुद्धिसंज्ञा च यदा प्रवेत्ति ज्ञातारमात्मानमहंकृतिः स्यात्,
तदा यदा सा त्वभिलीयतेऽन्तश्चित्तं च निर्धारितमर्थमेषा॥
(प्रपञ्चसारतंत्र, प्रथम पटल, १०२-१०३)

साक्षी, कारण तथा अंतर्यामी के रूप में परं धाम चिद्रूप पुरुष के साथ सम्बद्ध महाप्रभावशालिनी यह प्रकृति जब संकल्प-विकल्प करती है तब इसे मन कहा जाता है। निश्चयात्मिका होने पर बुद्धि और कर्ताभिमान से युक्त होकर पुरुष के स्थान पर स्वयं को कर्ता मानने पर अहंकार कहलाती है। साक्षीभूत आत्मा में लीन होने पर इसी प्रकृति की चित्त संज्ञा हो जाती है।

त्वमादिदेवः पुरुष: पुराण: साक्षात् स्वयं ज्योतिरजः परेश:।
त्वन्मायया मोहितचेतसो ये पश्यन्ति नानात्वमहो त्वयीशे॥
(माहेश्वर तंत्र, तृतीय पटल, २७)

हे ब्रह्म !! तुम पुराण पुरुष हो, साक्षात् रूप से स्वयं ज्योतिर्मय, अजन्मा और ईश्वर हो। तुम्हारी माया से मोहित चित्त होकर तुम्हारे में ही नानात्व का दर्शन होता है।

बिंदु: शून्यात्मको ज्ञेयस्तस्माद्विश्वं निरर्थकम्।
व्याप्तोऽहंकार एवायं ब्रह्माभासे दृश्यते॥
(माहेश्वर तन्त्र, एकविंश पटल, ३२)

(ब्रह्म के बहुत होने के चिंतन से उत्पन्न अहंकार नाम का तत्व, जो बिंदु बन गया) उस बिंदु को शून्यात्मक जानना चाहिए। इसीलिए विश्व निरर्थक (मिथ्या) है। इस विश्व में व्याप्त यह अहंकार ही ब्रह्म के आभास (चिद्विलास) के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

आप अपने सपने में खुद को देखते हैं…
क्या आप वहां खुद से अलग हैं ?? यदि नहीं, तो क्या वहां उड़ने पर आप यहाँ भी उड़ने लगते हैं ?? क्या वहां खाने पर आपका पेट यहाँ भी भर जाता है ??
नहीं न…

वही आपका चिद्विलास है, जिसके साथ चाहे जो हो जाये आपपर प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसीलिए वह मिथ्या है। जगत भी ब्रह्म का चिद्विलास है, और इसीलिए जगत भी मिथ्या है।

अब मैं दूसरी बात कहता हूँ :-
क्या आपके चिद्विलास का आपसे अलग होगा, सम्भव है ??
क्या आपके स्वप्न का, उसमें की गई सृष्टि, स्थिति और विनाश का एक एक कण, एक एक घटना, आपसे ओतप्रोत नहीं है ? बिल्कुल है।
क्या उसके एक भी अंश का अस्तित्व आपसे नहीं, या क्या उसके रूप में आप स्वयं ही नहीं ??
ओ, हां, बेशक आप ही तो हैं वहां।
लेकिन क्या आप वास्तव में वहां हैं.. नहीं।
लेकिन क्या आपके बिना उसका एक अंश भी सम्भव है.. नहीं।

एक दृष्टिकोण से आप वहां हैं, स्वप्न के रूप में। स्वप्न के घर, स्वप्न की नदी, पर्वत, मित्र, शत्रु, जड़, चेतन के रूप में। लेकिन वास्तव में वहां होकर भी नहीं हैं। ऐसे ही जगत मिथ्या भी है, और ब्रह्म भी है।

इसी लिए इस जगत को उसी प्रकार ब्रह्म माने जितना आप स्वयं अपना चिद्विलास हैं। और उस चिद्विलास को उतना ही मिथ्या मानें जितना कि आप अपने स्वप्न को। आपका स्वप्न जितना मिथ्या है, आप जैसे उसके कण कण में व्याप्त हैं, और आप जितने सत्य और स्वप्न के सापेक्ष कूटस्थ हैं, वैसा ही सम्बन्ध ब्रह्म और जगत के मध्य भी जानना चाहिए।

द्वैतवादी आक्षेपक :- फिर द्वैतवाद की आवश्यक्ता क्यों है ओर द्वैत का अद्वैत से विरोध क्यों रहता है ??

💐श्रीभागवतानंद गुरु 💐: द्वैत और अद्वैत दोनों मात्र दृष्टिकोण हैं, जो सत्य को स्वीकार करने के लिए दो माध्यम मात्र हैं। एक ही नदी के दो तटों पर खड़े दो भिन्न लोग, दो भिन्न दृष्टिकोण से दृश्य का वर्णन करते हैं। जैसे नदी के दो किनारे कभी नहीं मिलते, वैसे ही द्वैत और अद्वैत भी आपस में कभी नहीं मिलते। लेकिन दोनों का अस्तित्व नदी रूपी ब्रह्म से है। दोनों में से कौन वाला आधिकारिक तट है, अथवा यथार्थ तट है, ऐसी कोई बात मन में आती ही नहीं क्योंकि दोनों का सत्य समान है। ऐसे ही ब्रह्म रूपी नदी के द्वैत में अद्वैत में यथार्थ या सटीक सिद्धांत जैसा कुछ नहीं।

यदि आप पूर्व की ओर मुख किये रहेंगे तो सुबह सूर्य दिखेगा। यदि उसी समय पश्चिम की ओर देखेंगे तो नहीं दिखेगा। लेकिन यही बात शाम को उल्टी हो जाएगी। पश्चिम की ओर सूर्य दिखेगा लेकिन पूर्व की ओर नहीं दिखेगा।

शास्त्रों में द्वैत और अद्वैत नहीं है। वहां केवल सत्य है, और सत्य केवल ब्रह्म है, सत्य केवल सूर्य है। भेद तो उसकी प्रतीति में होती है, सूर्य पर दृष्टि का भेद नहीं पड़ता। पूर्वाभिमुख और पश्चिमाभिमुख व्यक्ति की दृष्टि से सूर्य प्रभावित नहीं होता। अद्वैतवाद और द्वैतवाद से ब्रह्म को कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सूर्य की प्रतीति दोनों को होती है, पूर्व वाले को सुबह और पश्चिम वाले को शाम में। दोनों सत्य हैं, दोनों एक का ही अवलोकन कर रहे हैं।

द्वैत वाला ब्रह्म को जानकर अद्वैती भी हो जाता है तथा अद्वैत वाला भी ब्रह्म को जानकर द्वैती हो जाता है। क्योंकि एक स्थिति में उन दोनों को यह ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में द्वैत और अद्वैत लक्ष्य नहीं, मार्ग है। और मार्ग चलने के लिए होता है, ठहराव हेतु नहीं। ठहराव हेतु तो लक्ष्य ही है। द्वैत का मार्ग अद्वैत की अपेक्षा अधिक सरल है, और इसे इंद्रियों के साथ जोड़कर समझना अधिक व्यावहारिक लगता है। जल न हो तो तैरेंगे कहाँ ? अंतरिक्ष न हो तो उड़ेंगे कहाँ ? द्वैत न हो तो अद्वैत की भावना करेंगे कहाँ ??

पश्चादुत्पद्यते ज्ञानं कुमारीसुरतं यथा।
किमप्युत्पद्यते तत्र मूकस्य स्वप्नं यथा॥
(हेवज्र तंत्र, द्वितीय कल्पराज, पंचमाभ्युदय पटल, ७०)

वह ज्ञान बाद में स्वतः उत्पन्न होता है। जैसे कुमारी को कोई सखी रतिसुख के बारे में बताए तो सुनकर भी वह नहीं जान सकती, वैसा ही यहाँ भी जानना चाहिये। जैसे मूक व्यक्ति अच्छे से देखे हुए स्वप्न को भी नहीं बता सकता है, वैसे ही यहाँ भी जानना चाहिए। बड़े बड़े गुरु भी सहजानन्द के विषय में नहीं बता सकते।
(यहाँ अपरिपक्व शिष्य को कुमारी कन्या और ब्रह्मज्ञानी गुरु को गूंगे की संज्ञा दी गयी है।)

आत्मानं मन्यते शेषं शेषिणं परमेश्वरम्।
अनुकम्पास्य भूतेषु तैरप्येषोऽनुकम्प्यते॥
(भार्गव तंत्र, २४/११)

जो स्वयं को शेष (अंश) और परमात्मा को शेषी (अंशी) मानते हैं, वे सभी भूतों पर दया करते हैं और बदले में दया पाते हैं।

(यह द्वैत भाव स्वयं परशुराम जी ने अगस्त्य जी को बताया है)

साथ ही,

न निंदेद्दक्षिणं वामं न निंदेद्दर्शनानि च।
निंदाद्रोहादिकर्तृणां गणनां नैव कारयेत्॥
(गन्धर्व तंत्र, सप्तविंश पटल, ३९)

दक्षिणमार्ग अथवा वाममार्ग की निंदा नहीं करनी चाहिए। चार्वाक बौद्ध आदि दर्शनों की भी निंदा नहीं करनी चाहिए। निंदा-द्रोह आदि करने वालों की संगति भी नहीं करनी चाहिए।

(यह निरपेक्ष भाव स्वयं शिव जी ने पार्वती जी को बताया है)

गन्धर्व तंत्र में ही आगे कहा है,
ऐक्यं जीवात्मनोश्चाहुर्योगं योग विशारदा:।

जीवात्मा की परमात्मा से एकात्मकता ही योग है। इस स्थिति को स्वीकार करके या जानकर ही योगी बनते हैं।

(यह अद्वैत भाव भी स्वयं शिव जी ने ही पार्वती जी से कहा है)

इसीलिए द्वैत और अद्वैत मात्र मार्ग हैं, लक्ष्य नहीं। लक्ष्य तो ब्रह्मत्व है, उसकी प्राप्ति का माध्यम चाहे जो भी हो। इसीलिए माध्यम और मार्ग के पीछे लड़ने से अच्छा है, कि ऊर्जा को लक्ष्य में लगाया जाए।

रामानुजाचार्य जी ने भी अद्वैत का खंडन नहीं किया। बस उसे चमका दिया। उसे सरस बना दिया। अद्वैत के पालन में जो नीरसता और सैद्धांतिक कठिनाई थी, उसे उन्होंने भक्ति का रंग चढ़ा कर अद्भुत रसयुक्त बना दिया। उन्होंने भी जीव और ब्रह्म की एक स्थिति में एकता मानी है।

निम्बार्काचार्य जी समदृष्टि अपनाते हैं। उन्हें दृष्टिकोण से नहीं मात्र दृश्य ब्रह्म से मतलब है। वल्लभाचार्य जी भी अद्वैत से विरोध करते ही नहीं और मध्वाचार्य जी खुद बड़ी बड़ी विडंबनाओं से घिरे हैं। कलियुग के साथ उनके गुप्त समझौते और उनके गुरु के समक्ष उनका पर्दाफाश आप सौर उपपुराण में देख लें। कुछ बहुत भविष्यपुराण में भी मिलेगा। तो बचे केवल आद्यशंकर महाभाग, जो सर्वथा विशुद्ध वैदिक और श्रुतिसम्मत स्मृतिपुराणागम के संरक्षक थे।

द्वैतवादी आक्षेपक :-
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नंबौद्ध उच्यते।
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा।
(पद्मपुराण, उत्तरखण्ड, २३६/७)

हे देवि !! मेरे (शिव जी के) द्वारा कलियुग में ब्राह्मण का अवतार लेकर मायावादी, वेदविरोधी वाक्य, जो अंदर से बौद्ध और बाहर से सनातनी था, ऐसे व्यक्ति के रूप में आकर कहा गया।
इस प्रकार आद्यशंकराचार्य पाखण्डी सिद्ध हुए।

💐श्रीभागवतानंद गुरु💐 :-

सार में इतना ही समझ लें :-

विवादित श्लोक में वर्णित व्यक्ति के शिवावतार ब्राह्मण होने के अतिरिक्त उसके मत की तीन विशेषताएं हैं :-

१:- वह मायावादी है।
२:- वह असत शास्त्र का प्रवर्तक है।
३:- वह प्रच्छन्नबौद्ध है।

आद्यशंकराचार्य जी पर इनमें से केवल एक बात लागू होती है, शिवावतार ब्राह्मण।

मायावाद केवल उनके विरोधियों की दृष्टि में है। जिनका पूरा जीवन ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या कहते बीता, वे ब्रह्मवादी न होकर मायावादी हो गए ??

असत शास्त्र तो उनका मत है नहीं। सर्वथा वैदिक मत ही उनका आधार रहा है। बल्कि उन्होंने तो असत शास्त्र का खंडन करने के उद्देश्य से ही दिग्विजय किया था।

अब आते हैं प्रच्छन्नबौद्ध पर। जैसे कीचड़ से कीचड़ नहीं साफ किया जाता, वैसे ही बौद्ध से बौद्ध नहीं मिटते। आद्यशंकर गुरुदेव का पूरा जीवन ही बौद्धखण्डन पर केंद्रित रहा।

अब आपको मैं वह बात बताता हूँ, जो सामने होकर भी नहीं दिखी। वर्तमान को अतीत के बिना नहीं जाना जा सकता। आप विवादित श्लोक के पिछले अध्याय को देखें। उसमें पार्वती जी के प्रश्न के उत्तर में शिव जी ने कापालिक और अवैदिक चिह्नों से युक्त वेदविरुद्ध आचरण वाले विष्णुनिंदक लोगों को पाखंडी बताया है। और आगे यह भी कहा कि राक्षसों की वृद्धि को रोकने कब लिए कणाद, गौतम, कपिल आदि दस ऋषियों को अपने नास्तिक और भौतिक प्रधान दर्शन शास्त्र को फैलाने भेजा गया, फिर विष्णु जी और शिव जी ने आपसी सहमति से अवतार लिया। दोनों के अवतार का उद्देश्य केवल पाखण्ड प्रवर्धन ही था।

यहाँ बुद्ध के रूप में वैष्णव अवतार का तो स्पष्ट नाम से वर्णन है, लेकिन शंकराचार्य का नाम शैव अवतार के रूप में नहीं है। केवल शिवावतार ब्राह्मण, ऐसा वर्णन है। हां, उसकी तीन विशेषता, मायावादी, असत शास्त्रज्ञ और प्रच्छन्न बौद्ध अवश्य है, जो किसी भी प्रकार से आद्यशंकर महाभाग में आरोपित नहीं की जा सकतीं।

तो फिर यहाँ पर यह शिवावतार है कौन ? ये वही लोग हैं जिनके बारे में पिछले अध्याय में कहा गया है। कापालिक मत वाले वाममार्गी। जिन्हें दक्ष प्रजापति की सभा में नंदीश्वर के श्राप के प्रत्युत्तर में भृगु जी ने वेदविमुख और पाखण्डवादी होने का श्राप दिया था। पिछले अध्याय में भी शिव जी ने उनका ही वर्णन किया है, और यहाँ वही कापालिक शिवावतार का संकेत है, न कि आद्यशंकर महाभाग का।

कापालिक घोर मायावादी हैं, इसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। कापालिक वेदविमुख वाममार्गी विष्णुनिंदक असत शास्त्र से युक्त हैं, यह भी स्वतः सिद्ध है। बौद्धों का भोगवादी वज्रयानी मत कापालिक मत से बिल्कुल समानता रखता है, फिर भी कापालिक खुद को सनातनी ही कहते हैं, बौद्ध नहीं, यही इनका प्रच्छन्न बौद्धवाद है।

इसीलिए बुद्ध के समर्थक मत वाले कापालिक आचार्य ही शिवावतार पाखण्डवादी ब्राह्मण हैं, न कि पाखण्डवाद का विरोध करने वाले शिवावतार श्रीशंकराचार्य जी। हममें आद्यशंकर गुरुदेव के प्रति थोड़ी भी कृतज्ञता होगी तो हम उनपर अनर्गल कलंक नहीं लगाएंगे। हम देवी सरस्वती, व्यास जी और हनुमान जी के उस कृत्य का सम्मान करंगे जहां उन्होंने आद्यशंकर महाभाग की श्रेष्ठता को प्रमाणित किया है।

श्लोक में वर्णित शिवावतार ब्राह्मण आचार्यश्री नकुलेश हैं। उन्हें ही नकुलीश, लकुलीश या लकुटीश भी कहते हैं। मेरु तंत्र, मालिनीविजयोत्तर तंत्र आदि में इनके नाम आये हैं। उन्होंने ही कापालिक मत की स्थापना की, जो बौद्धों के सहजयान और वज्रयान से लगभग मिलता जुलता है, हालांकि फिर भी कापालिक खुद को बौद्ध नहीं मानते इसीलिए वे प्रच्छन्नबौद्ध हैं। बौद्धों के सहजयानी सम्प्रदाय का चर्यापद पढ़ें या वज्रयानी सम्प्रदाय का गुह्यसमाज या हेवज्र तन्त्र, कापालिकों से समानता दिख जाएगी। प्रत्यक्ष बौद्धों के साथ इन प्रच्छन्न बौद्धों का भी खण्डन श्री आद्यशंकर गुरुदेव ने किया था। नकुलीश और बुद्ध के मत में समानता है। नकुलीश मायावादी असत शास्त्र वाले प्रच्छन्न बौद्ध भी हैं और शिवावतार भी।

दुर्भाग्य से इनके विषय में अधिक ऐतिहासिक जानकारी है नहीं इसीलिए बहुतों ने तो इनका नाम भी नहीं सुना है। आद्यशंकर वो पाखंडी अवतार नहीं जिसका संकेत शिव जी कर रहे हैं। शिवावतार वाममार्गी नकुलीश ने ही कापालिक सम्प्रदाय चलाया जिनको आद्यशंकराचार्य जी ने बौद्धों के साथ ही पराजित किया।

अब देखिए, पूर्वाध्याय के तीसरे श्लोक में शिव जी ने स्पष्ट रूप से कापालिक, भस्म धारी अवैदिक चिह्नों से युक्त वेदविमुख विष्णुनिंदक सम्प्रदाय को पाखण्डवादी कहा है, ये सारे लक्षण नकुलीश के सम्प्रदाय में हैं, लेकिन आद्यशंकर के सम्प्रदाय में नहीं हैं। साथ ही आज भी नकुलीश का सम्प्रदाय जीवित है। उनके कापालिक सम्प्रदाय से ही कालमुख साधक निकले जिन्होंने लिंगायत सम्प्रदाय की स्थापना की, जो आज भी सनातन के मूल सिद्धांतों के लिए एक बड़ी समस्या है।

ये कापालिक और वज्रयानी इतने दुष्ट होते हैं कि यदि उनके आश्रम क्षेत्र में कोई भी लड़की 12 से अधिक वर्ष की आयु वाली घुस गई तो वे तब तक बलात्कार करते हैं जब तक वो मर न जाये। और ऐसे ही यदि महिला वज्रयानी के शिविर में पुरुष घुस जाए तो बलपूर्वक उससे महिलाएं इतना बलात्कार करती हैं कि पुरुष का प्राणान्त हो जाये। आप नहीं जानते हैं इन्हें। कामधेनु तन्त्र का एक प्रयोग ही इनके शिविर में जाने के बाद प्राण रक्षा करता है जिसे मैं आज तक खोज रहा हूँ, मिला नहीं है अब तक। इनका विरोध विशेष कर ब्राह्मणों से रहता है और ये उन्हें मारकर उनकी हड्डियों की माला पहन लेते हैं। हेवज्र तन्त्र के द्वितीय कल्पराज के दसम जापपटल में वर्णन मिलेगा। और मैंने ये ऐसे ही नहीं लिखा। इनके सम्प्रदाय में आठ महिलाओं से सामूहिक सम्भोग करने की भी बात बताई गई है।

जननी भगिनी चैव दुहिता भागिनेयिका।
मातुलस्य तथा भार्या मातृभगिनी च श्वसृका।
पितुर्भगिनी तथा चैव अष्टौ विद्या: प्रकीर्तिताः॥

12 से लेकर 24 वर्ष की जो महिला मिल जाये, चाहे जो माता, बहन, बेटी, भांजी, भाभी, चाची, सास, बुआ कोई भी हो, ये उसे नहीं छोड़ते। आगे इनके सम्प्रदाय का नियम है, उस नारी के चयन हो जाने पर :-

तां च विवस्त्रकां कृत्वा भगं चुम्बयेन्मुहुर्मुहुः।
ताभिश्च वृष्यते बोलं गीयते नृत्यते परम्॥

(अर्थ जानबूझकर नहीं लिख रहा, लगभग सभी विद्वान् लोग सामान्य संस्कृत जानते ही हैं)

आपको अभी कटु लग रहा है न। ये जय भीम वाले दुष्टों को ज्ञात हो जाये तो कल हमारे घर भी चढ़ आएंगे धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देकर। विदेशों में मुल्ले धार्मिक स्वतंत्रता के नामपर सामूहिक बलात्कार कर ही रहे हैं। हम तो केवल आप सबों को हरेक मत और सम्प्रदाय के उन रहस्यों से अवगत करा रहे हैं जो घातक सत्य होने पर भी समाज में नहीं आते।

मैं आचार्यश्री नकुलीश का बहुत सम्मान करता हूँ, हमलोग उनके पैरों की धूल के बराबर भी नहीं। लिंग पुराण में उन्हें शिव जी का २८वां अवतार बताया गया है। उन्हें बाद में भैरवत्व की प्राप्ति हुई और कलकत्ता के काली घाट में पीठरक्षक भैरव के रूप में नियुक्ति मिली थी। उन्होंने शिवयोगसूत्रों की भी रचना की थी। इन सूत्रों को पाशुपत सूत्र भी कहा जाता है, जिसपर बाद में आचार्य कौण्डिन्य ने पंचार्थ भाष्य लिखा था।

कूर्म पुराण, वायु पुराण, और स्कंद पुराण (अवंती खण्ड) के अनुसार उनका जन्म कायावतार क्षेत्र के (वर्तमान में गुजरात के वडोदरा में) एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने चार शिष्यों (कौरुष्य, गर्ग, मित्र और कुशिक) के साथ पाशुपत मत को स्थापित किया। उनका काल महाभारत के समय का माना जाता है। आचार्यश्री नकुलीश ने हठयोग और सांख्य तन्त्र (द्वैतमत वाला) को प्रचारित किया। उन्होंने अखण्ड ब्रह्मचर्य (ऊर्ध्वरेता) का भी समर्थन किया था। हालांकि उन्होंने भी अपने जीवनकाल में तात्कालिक जैन तथा बौद्धों के साथ बहुत शास्त्रार्थ किये और उनका विरोध किया। लेकिन बाद के कापालिक और बौद्ध आपस में मिल गए और नकुलीश तथा बुद्ध के मूल सिद्धांतों की भीषण दुर्गति कर दी। बाद में द्वैतवादी कापालिक और बौद्धों को एक साथ आद्यशंकराचार्य जी ने हराया। पूर्वकाल में बौद्धों को हराने वाले शिवावतार मायावादी असत शास्त्र वाले ब्राह्मण आचार्यश्री नकुलीश ही थे।

उन्होंने शिव जी की स्वामी भाव से उपासना की थी। अर्थात् वे स्वयं को स्वामी और शिव को सेवक मानते थे। इसीलिए शिव जी सदैव आज्ञाकारी बनकर उनकी सेवा किया करते थे। हालांकि यह उनकी तपस्या, ब्रह्मज्ञान और भक्ति का ही प्रभाव था कि शिव जी ने उनपर ऐसी कृपा की।

पार्वती जी को शिव जी ने पद्मपुराण वाले प्रसङ्ग में जहाँ पाखण्डवाद के बारे में कहा है, वहां पाशुपत मत वाले विष्णुनिंदक कापालिक, ये शब्द बार बार स्पष्ट रूप से आया है। उसी प्रकरण में आगे शिव जी ने ब्राह्मण परिवार में आकर मायावाद, असत शास्त्र, प्रच्छन्न बौद्ध वाले अवतार के बारे में कहा है। गोरक्षसिद्धान्तसङ्ग्रह में वर्णन है कि कापालिक आचार्यों ने (श्रीनाथ आदि गुरुत्रय के दूतों ने) भगवान विष्णु के चौबीसों अवतारों के शीश काट कर उनके कपाल को धारण कर लिया था जिस कारण उन्हें वेदबाह्य कर दिया गया था। वहीं से कापालिकों का पतन शुरू हुआ जो देवताओं का मुख्य उद्देश्य भी था और जिसका वर्णन पद्मपुराण वाले प्रसङ्ग में भी है।
इसके अतिरिक्त प्रमाणों पर ध्यान दें :-
कल्यब्दे द्विसहस्त्रान्ते लोकानुग्रहकाम्यया।
चतुर्भि: सह शिष्यैस्तु शंकरोऽवतरिष्यति॥
( भविष्य पुराण )
अर्थ :- ” कलि के दो सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने के पश्चात लोक अनुग्रह की कामना से श्री सर्वेश्वर शिव अपने चार शिष्यों के साथ अवतार धारण कर अवतरित होते हैं।

निन्दन्ति वेदविद्यांच द्विजा: कर्माणि वै कलौ।
कलौ देवो महादेव: शंकरो नीललोहित:। ।
प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृति:।
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शंकरम्। ।
कलिदोषान्विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्॥
(लिंगपुराण ४०. २०-२१.१/२)
अर्थ :- कलि में ब्राह्मण वेदविद्या और वैदिक कर्मों की जब निन्दा करने लगते हैं ; रुद्र संज्ञक विकटरुप नीललोहित महादेव धर्म की प्रतिष्ठा के लिये अवतीर्ण होते हैं। जो ब्राह्मणादि जिस किसी उपाय से उनका आस्था सहित अनुसरण सेवन करते हैं ; वे परमगति को प्राप्त होते हैं।

कलौ रुद्रो महादेवो लोकानामीश्वर: पर:।
न देवता भवेन्नृणां देवतानां च दैवतम्। ।
करिष्यत्यवताराणि शंकरो नीललोहित:।
श्रौतस्मार्त्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया। ।
उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मसंज्ञितम्।
सर्ववेदान्तसारं हि धर्मान् वेदानदर्शितान्॥
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनोपचारत:।
विजित्य कलिजान्दोषान्यान्ति ते परमं पदम्॥
( कूर्मपुराण १.२८.३२-३४)
अर्थ:- ” कलि में देवों के देव महादेव लोकों के परमेश्वर रुद्र शिव मनुष्यों के उद्धार के लिये उन भक्तों की हित की कामना से श्रौत-स्मार्त -प्रतिपादित धर्म की प्रतिष्ठा के लिये विविध अवतारों को ग्रहण करेंगें। वे शिष्यों को वेदप्रतिपादित सर्ववेदान्तसार ब्रह्मज्ञानरुप मोक्ष धर्मों का उपदेश करेंगें। जो ब्राह्मण जिस किसी भी प्रकार उनका सेवन करते हैं ; वे कलिप्रभव दोषों को जीतकर परमपद को प्राप्त करते हैं।

व्याकुर्वन् व्याससूत्रार्थं श्रुतेरर्थं यथोचिवान्।
श्रुतेर्न्याय: स एवार्थ: शंकर: सवितानन:॥
( शिवपुराण-रुद्रखण्ड ७.१)
अर्थ:- “सूर्यसदृश प्रतापी श्री शिवावतार आचार्य शंकर श्री बादरायण – वेदव्यासविरचित ब्रह्मसूत्रों पर श्रुतिसम्मत युक्तियुक्त भाष्य संरचना करते हैं।

इससे स्पष्ट संकेत हो जाता है कि वहां लक्षणों से आचार्य नकुलीश की ही बात है। वही मायावादी असत शास्त्र वाले प्रच्छन्न बौद्ध हैं। आद्यशंकराचार्य जी का न तो नाम है, न वहां वर्णित बातें उनके जीवन से मिलती हैं। आगे मैं प्रमाण और तर्कों से अपना मत सिद्ध कर चुका हूँ। मेरे दृष्टिकोण से न तो शंकराचार्य जी का अपमान हो रहा है, न पद्मपुराण गलत हो रहा है। अपितु वह ऐतिहासिक सत्य, जिसे हम भूल रहे थे या ध्यान नहीं दे रहे थे, वह सामने आ रहा है जो सर्वथा ग्रंथ और इतिहास के अनुकूल है।

श्रीमद्रामानुजाचार्य जी भगवान ने अपने भाष्यों और शास्त्रार्थों से वेदार्थ को प्रकाशित किया है। कुछ लोग कहते हैं कि मायावाद और असत् शास्त्र की उपाधि अद्वैत शांकर मत को दी गयी है किंतु यह बात ऐसी नहीं है।

पाखण्डैर्बहुभिर्दुष्टैस्त्यक्तवेदै: कुबुद्धिभि:।
प्राप्तैरासुरशास्त्राणि कल्पितानि कुयुक्तिभिः॥
सर्वतः सङ्कुलं लोकं विनष्टहरिवैभवम्।
उद्धर्तुं लक्ष्मणो योगी कृत्वा श्रीभाष्यमुत्तमम्॥
पाखण्डबौद्धचार्वाकमायावाद्यार्हतादिकान्।
सम्भित्वा कुमतान्सर्वान्पाराशर्यमुनेर्मतम्।
लोकेऽस्मिन्प्रकटीचक्रे विष्णो: प्रियतमं महत्॥

(भार्गव उपपुराण, उत्तरखण्ड, ३८/५१-५४)

अर्थात् :-
जब बहुत से पाखण्डवादी दुष्टों के द्वारा वेदों का त्याग करके कुबुद्धि के कारण इस लोक में परम पवित्र वैष्णव मत को नष्ट करके आसुरी शास्त्रों को कपोलकल्पित रीति से फैलाया जाने लगा, तब श्रीलक्ष्मण (रामानुज) योगिराज ने श्रीभाष्य लिखकर उन पाखण्डवादी बौद्ध, चार्वाक एवं मायावादी अर्हत (जैनी) आदि के कुमत का नाश करके वेदव्यास जी के द्वारा प्रणीत भगवान विष्णु के प्रिय मत को इस संसार में प्रकाशित किया।

इस प्रमाण के अनुसार पाखण्डी और अर्हत को मायावादी बताया गया है। अब शंका हो सकती है कि पाखण्डी और अर्हत कौन हैं ??

एतेन्ये च त्रयीबाह्या: पाखण्डा: पापचारिण:।
पाशब्देन त्रयीधर्म: पालनाज्जगतः स्मृत:।
तं खंडयन्ति यस्मात्ते पाखण्डास्तेन हेतुना॥
(माहेश्वर तंत्र, अष्टादशपटल)

जो वेदत्रयी को न माने, वह पापाचारी ही पाखण्डी है। ‘पा’ शब्द से वेदत्रयी के धर्मानुसार लोकव्यवहार करना बताया गया है। जो उसका खण्डन करे वही पाखण्डी बताया गया है।

तपश्चरसु सर्वेषु असुरेषु जयार्थिषु।
विष्णु: सुदुस्तरां मायामास्यास्य सुरनोदित:॥
मोहयामास योगात्मा तपोविघ्नाय तान्प्रभु:।
स मूढान् बुद्धरूपेण तानुवाच महामना:॥
शक्या जेतुं सुराः सर्वे युष्माभिरितिदर्शनै:।
बौद्धधर्मं समास्थाय शक्यास्ते बभूविरे॥
तानुवाचार्हतो मम यूयं भवत मद्विधा:।
ज्ञानेन सहितं धर्मं ते चार्हन्त इति स्मृताः॥
बौद्धश्रावकनिर्ग्रंथा: सिद्धपुत्रास्तथैव च।
ऐते सर्वेपि चार्हंतो विज्ञेया दुष्टचारिण:॥

(माहेश्वर तंत्र, अष्टादश पटल)

विजय की कामना से तपस्या करने वाले असुरों को विष्णु भगवान ने मोहित करने वाली माया से वश में करके बुद्ध रूप धारण करके कहा :- “दर्शनों के पालन से सभी देवता आप लोगों के द्वारा जीते जा सकते हैं अतः आप सब बौद्ध धर्म में आस्थावान् होकर उन्हें जीत सकते हैं।” बुद्ध भगवान के ऐसा करने पर वे असुर बौद्ध मतावलंबी हो गए। उन्हें धर्मलोप किया देख भगवान ने कहा, जैसा मैं हूँ, वैसे ही तुम सब हो जाओ और बताए गए ज्ञान के सहित इस बौद्ध धर्म का पालन करो। इसीलिए वे सब पुनः अर्हत कहाये। बौद्ध श्रावक, निर्ग्रंथी, और सिद्धपुत्र (जैनी) ये सब दुष्ट बुद्धि वाले अर्हन्त के नाम से जाने गए।

अब यहाँ पाखण्डी और अर्हत की परिभाषा के बाद मायावादी की परिभाषा पर आते हैं :-

पूर्णे कलियुगे प्राप्ते आर्यावर्ते चलिष्यति।
मायावादमसच्छास्त्रं वदिष्यन्ति नराधमा:॥
अद्वैतनिंदानिरताः प्रच्छन्नग्रंथगौरवा:।
अन्यदर्शनसिद्धांतं नैव जानन्ति तत्वतः॥
संसारतत्वमित्येव परं ते तत्ववादिनः।
मायाविलसितंविश्वमिति मायैकवादिनः॥
अद्वैतं शिवमीशानमज्ञात्वा नैव मुच्यते।
घोरे कलियुगे प्राप्ते श्रीशंकरपराङ्मुखा:॥
तत्वं संसार इत्येव न बाध्य: सत्य एव हि।
वदत्यतस्तत्ववादी मिथ्यावादी स उच्यते॥
मिथ्याभूतः प्रपञ्चोऽयं मया निर्मित इष्यते।
मायावादिन इत्येते वस्तुतस्तत्ववादिनः॥

(सौर उपपुराण)

अर्थात्,
कलियुग के आने पर आर्यावर्त में पापी मनुष्यों के माध्यम से असत शास्त्र एवं मायावाद का बोलबाला हो जाएगा। वे लोग अद्वैतसिद्धांत की निंदा करने वाले और मनमाने ग्रंथों से स्वयं को गौरवांवित अनुभव करेंगे, उन्हें अन्य दर्शनों का तत्व भी ज्ञात न होगा। वे कहेंगे कि यह संसार एक शाश्वत तत्व है और इसीलिए हम तत्ववादी हैं। यह सम्पूर्ण विश्व माया की सत्ता से स्थित है, ऐसा कहने वाले मायावादी ही होंगे। ईशान शिव के अद्वैत मत को न जानने से उनका मोक्ष नहीं होगा और घोर कलियुग आने पर वे शांकर सिद्धान्तों से विमुख हो जाएंगे। वे मायावादी कहेंगे कि यह संसार सत्य है इसीलिए इसका कोई पराभव या मिथ्यावादिता नहीं है, और इस प्रकार स्वयं को तत्ववादी बताने वाले वे लोग वस्तुतः मिथ्यावादी ही होंगे। यह संसार मिथ्या से निर्मित है (इसीलिए ब्रह्म भी मिथ्या ही है) और यह संसार मुझसे (स्त्री पुरुष के मैथुन से) ही प्रवर्तित है, ऐसे कहने काले स्वघोषित तत्ववादी ही मायावादी होते हैं।

इस प्रकार से श्रीआद्यशंकराचार्य जी का सिद्धांत मायावाद नहीं है, पाखण्डवाद नहीं है और न ही श्रुतिविरुद्ध है। अपितु सर्वत्र ही जिस मायावाद, असत शास्त्र, प्रच्छन्न बौद्ध का वर्णन है वह तो कापालिक, जैन, बौद्ध, चार्वाक आदि अद्वैतनिंदक मायावादी लोगों के विषय में कहा गया है। ब्रह्मनाद का उद्घोष करने वाले श्री शंकराचार्य जी तो ब्रह्मवादी ही हो सकते हैं, मायावादी कदापि नहीं।

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(दोनों पक्षों में हुई शास्त्रचर्चा के आधार पर)
पोस्टकर्ता :- ब्रजेश पाण्डेय चांद्रायण
श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru

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