जानिए – मुक्ति श्राद्ध से या पुराण श्रवण से ?

जानें क्या है अक्षय तिथियां तथा इनका क्या महत्व हैजानिए मुक्ति श्राद्ध से या पुराण श्रवण से ?

 

कर्मफल ही बंधन का कारण है। कर्मफल यदि नष्ट हो तो ही जन्म मरण के चक्र से मुक्ति सम्भव है।

 

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि

 

न हि कश्चित क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वप्रकृतिजैर्गुणै: ॥

 

अर्थात् किसी भी जीव का कोई भी क्षण बिना कर्म किये नहीं बीतता क्योंकि प्रकृतिजन्य गुणों से सभी जीव आबद्ध होकर बलपूर्वक कर्म में नियोजित किये गए हैं।

 

योगदर्शन में ईश्वर की परिभाषा में कहा गया है :-

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष: ईश्वरः॥

अर्थात् क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, एवं अभिनिवेश) तथा कर्मविपाक (पाप, पुण्य, पाप-पुण्य मिश्रित, तथा पाप-पुण्य रहित कर्म) के बंधन तथा प्रभाव से शाश्वत रूप से मुक्त चैतन्य विशेष की संज्ञा ईश्वर है।

 

कर्मविपाक के अंतर्गत आने वाले कर्मों को पहले परिणाम के आधार पर पूर्वोक्त चार एवं पुनः काल के आधार संचित, क्रियमाण एवं प्रारब्ध के रूप में तीन भागों में विभाजित किया गया है।

 

कर्मों में सात्विकता दैवी सम्पदा के संस्कारों को पुष्ट करके उन्नति का कारण बनती है तथा तामसिकता आसुरी सम्पदा के संस्कारों को पुष्ट करके अवनति का कारण बनती है। वहीं राजसी वृत्ति उन्नति तथा अवनति के मध्य उलझाए रखकर व्यक्ति को मानवी सम्पदा के मध्य बांध कर रखती है।

 

श्रीकृष्ण भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है :-

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था: मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:।

जघन्य गुण वृत्तिस्था: अधो गच्छन्ति तामसा:॥

 

सात्विक कर्मजन्य पुण्य की अधिकता से देवत्व, तमोजन्य पाप की अधिकता से नारकीय गति तथा राजस कर्मजन्य भ्रामक कर्म की अधिकता से मनुष्यता मिलती है।

 

इन तीनों से ही विलक्षण है मुक्ति। कुछ लोगों का मानना है कि मुक्ति देहत्याग के बाद होती है, जबकि अन्य जन देह में रहते हुए भी मुक्ति की संभावना बताते हैं। इच्छा ही कर्म का कारण है तथा कर्म ही बंधन का कारण है। शरीर नष्ट हो गया और इच्छाएं शेष रह गईं तो वह मृत्यु है, तथा शरीर बचा रहा तथा इच्छाएं समाप्त हो गईं तो वह मुक्ति है। हालांकि मुक्ति के भी कई प्रकार होते हैं परंतु वर्तमान में सम्बंधित विषय पर ही चर्चा करेंगे।

 

कुछ कहते हैं कि पुराण श्रवण से मुक्ति होती है और पद्मपुराण से उद्धरण देते हुए कहते हैं कि :- क्षीयन्ते चास्य कर्माणि सप्ताह श्रवणे तथा।

अन्य जन महाभारत एवं वाराहपुराण के अनुसार श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ से मुक्ति की बात कहते हैं। कुछ लोग विष्णुधर्मोत्तर, गृह्यसूत्र तथा स्मृतियों के अनुसार श्राद्ध आदि कर्मों से मुक्ति मानते हैं। अन्य विद्वान श्रीआद्यशंकर महाभाग के विवेक चूड़ामणि का उद्धरण देते हुए कहते हैं कि मुक्ति केवल ब्रह्मज्ञान और आत्म साक्षात्कार से ही सम्भव है। यथा :-

न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया।

ब्रह्मात्मैकत्वबोधेन मोक्षः सिद्ध्यति नान्यथा॥

 

कुछ पुराणों में वर्णन मिलता है कि गया श्राद्ध से मुक्ति होती है। जबकि अन्य पुराण ऐसी घटनाओं का वर्णन करते हैं जब गया श्राद्ध के बाद भी मुक्ति नहीं हुई और ब्रह्मकपाली जाना पड़ा। पद्मपुराण में वर्णन मिलता है कि करोड़ों श्राद्ध करने से भी मुक्ति संदिग्ध है और श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता आदि का श्रवण समीचीन है। सम्मोहन तन्त्र आदि गर्ग संहिता, महाभारत आदि का बखान करते हैं। रुद्रयामल तन्त्र आदि कुंडलिनी जागरण एवं सहस्रार भेदन की क्रिया को मुक्ति का निमित्त मानते हैं।

 

ऐसे में सर्व साधारण हिन्दू जनता, जो एक तो स्वयं ही ग्रंथों के अध्ययन से दूर है, दूसरे पाखंडियों के व्यूह में फंसी है, विरोधाभास में फंस कर अनास्था का शिकार हो जाती है जिसका अनुचित लाभ वामपंथी तथा ईसाई आदि धर्मांतरण षड्यंत्री उठाते हैं।

 

श्रुति भगवती का औपनिषदिक उद्घोष है,

 

भिद्यते हृदयग्रन्थि: छिद्यन्ते सर्वसंशया: ।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे: ॥

 

जब हृदय की गांठ खुले और सभी संशयों का नाश हो, तब कर्म और कर्मफल का क्षय होता है, उस परमात्मा का आत्मसाक्षात्कार होता है। समान उक्ति श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के सप्तम स्कंध में भी है।

 

मनोमयः प्राणशरीरनेता, प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।

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तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा, आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥

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