आखिर कब तक ??? मध्यप्रदेश भाग-1

आखिर कब तक ??? मध्यप्रदेश भाग-1आखिर कब तक ???

 

मध्यप्रदेश भारत का वह राज्य जो मध्यभूमि में स्थित खनिज संपदा से भरपूर ,कलकल करती नदियां,सघन वन और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर लेकिन यहाँ के आम जनता की मुश्किलें देखिए तो पहाड़ से भी दुष्कर है।

 

मप्र का पानी उप्र ,राज्स्थान, गुजरात और बिहार उपयोग करता है यहाँ की खनिज संपदा अन्य राज्यों में सस्ती है और यहाँ उसके संशाधन मंहगे।

 

यहाँ दो दल का ही शासन रहा जिसमें शुरुआती 50 वर्ष तक लगभग कांग्रेस सत्ता में रही उसके बाद अब भाजपा सत्तारूढ़ है।

 

कांग्रेस ने इस शांत प्रदेश मे खोखले धर्मनिर्पेक्षता के बल पर मुस्लिम समुदाय को डर दिखाकर सत्ता हासिल करती रही तो भाजपा अब हिन्दुत्व का स्वप्न दिखाकर। हम 1990 से अगर देखें तो भाजपा यहाँ श्री रामलला के रथ पर सवार होकर सत्तारूढ़ हुई और मप्र के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री सुन्दर लाल पटवा ने एक साफ सुथरी सरकार दी लेकिन 1993 में अयोध्या मंदिर भंग से राज्य की सरकार बर्खास्त कर दी गई। फलत: हिन्दू उबाल से घबरा कर कांग्रेस ने वादों की वादों की झड़ी लगाकर फिर से सत्तारूढ़ हुई।

 

मप्र को एक ऐसा मुख्यमंत्री मिला जो केवल बातूनी और दिनभर हिन्दू आतंकवाद , संघ और साम्प्रदायिकता में ही भटका रहा। वादों के कारण बिजली,पानी सरकार को मुफ्त देना पड़ा पड़ा इसलिए राजकोषीय घाटा बहुत ज्यादा बढ गया।

 

एक संपन्न प्रदेश का खजाना खाली ,ऐसे में प्रदेश भर में कर्मचारियों की भर्ती बंद कर दी गई तो शासन का काम और सरकारी संस्थानों का दम फूलने लगा तब कुटिल मुख्यमंत्री ने संविदा शब्द की खोज की। सरकारी काम को गति देने के लिए संविदा कर्मचारीगण रखे जाने लगे। प्रदेश के बेरोजगारों को तब एक संविदा अवसर जैसे मिला, खाली ,आधापेट कर्मचारी सुखद भविष्य के आगम में काम करने लगे।

 

1999 के चुनाव में फिर झूठ की रणभेरी बजी और दिग्विजय सिंह वापस सिंहासनारूढ़ हुए। खजाना खाली, कर्मचारी नाममात्र के तो फिर संविदा भर्ती आगे बढी। सन 2004 में मप्र में सत्ता का परिवर्तन ऐसा होता है कि 230 सीट की विधानसभा में कांग्रेस 30 सीट भी नहीं बचा पाती और श्री उमा भारती मुख्यमंत्री बनती हैं।कतिपय कारणों से उनको हटना पड़ता है और कुछ समय के लिए बाबूलाल गौर और फिर श्री शिवराज सिंह चौहान आ विराजते हैं।

 

मप्र में लगा शिवराज नहीं रामराज्य का शासन आ गया है। बेपटरी हालात हो चुके प्रदेश में एक जोश भर गया, रात दिन बराबर प्रदेश चलने लगा, मप्र बीमारु राज्य से खुशहाल प्रदेश बनने लगा। किसी भी राज्य की जरूरत बिजली, पानी और सड़क मुख्य जरूरत है जो कि एक मिसाल के तौर जरूरत पूरी हुई। खाली खजाना भरने लगा लेकिन दिन नहीं बदला तो केवल संविदा कर्मचारियों का यह वर्ग पहले से भी ज्यादा बढती मंहगाई से फटेहाल होता गया। समय के साथ इन कर्मचारियों का गुस्सा बढने लगा तो शिवराज ने चुनाव पूर्व इन पर भी दाना फेंका।

 

पंरतु विधाता की चाल तो देखिये अचानक से शिवराज प्रदेश भर की महिलाओं के भाई बन गये और बच्चों के मामा फलतः उनकी भार्या साधना का भी राजनीति में दबी प्रवेश हो गया। फिर क्या रामराज्य से सूबा रावणराज की ओर गतिमान होता गया। एक से बढकर एक घोटाले होने लगे ,कभी डंपर तो कभी कोयला , कभी बिजली की किल्लत तो कहीं सड़क धराशायी , बढती घूसखोरी , कुल मिला के जनता मे त्राहिमाम।

 

ऐसे में भारत के सबसे बुद्धिजीवी वर्ग आई एस की शरण में मामा चले गये। यह वर्ग जो आमजनता को खरपतवार के जैसे देखता है उखाड़ फेंकने के लिए एक से बढकर एक फर्जी योजनाएं रचने लगा और शरणागत शिवराज की मदद करने लगा। चुनाव में जीत से शिवराज पूरी तरह इस बिरादरी के अधीन नतमस्तक हो गये और मप्र ही नही बल्कि संसार का सबसे बड़ा घोटाला ब्यापम रच दिया, बेरोजगारों को हर तरह से छला जाने लगा,कूट घोषणाएं और झूठी योजनाओं ने सम्पूर्ण प्रदेश का बंटाधार कर दिया।

 

मामा ही खिलाड़ी है मामा ही निशाना है

 

आखिर कब तक ये फर्जी घोषणाएं और योजनाएं काम आती , हर 5 साल में चुनाव होने हैं। कर्मचारियों में भीषण असंतोष है संविदा कर्मचारी भूख और आर्थिक तंगी से बिलबिला रहा है अब क्या करें, ऐसे में फिर बुद्धिजीवी काम आए।

पहला किसानों को भावांतर योजना और कर्मचारियों में संगठन खड़ा करके उन्हीं से उन्ही से लतियाना।

 

किसान भावुक होता है भावांतर और अन्य योजनाओं ने ऐसा तेल निकाला कि वह सचमुच ही खुद को सरकारी मदद के बगैर ज्यादा खुशहाल खुद को सोचने लगा और कर्मचारी में ऐसे लुटेरे पथभ्रष्ट, बेईमान नेता आगे आए जिसके आगे शिवराज खुद को ही हीन समझने लगे।

 

ये बेचारे कर्मचारी नेता एक पूर्व कर्मचारी के विधायक बनने की प्रक्रिया से खुद को जोड़ लिए, और यथासंभव खुद के लूट के लिए हाथपैर मारने लगे। खुद के लिए चंदा इकट्ठा करते और मुख्यमंत्री को गाली देते फिरते और भोपाल से पेट्रोल पंप जुगाड़ते और कुछ चतुर वक्ता टिकट के लिए हाथ पैर मारते।

 

कुल मिला के देखें तो सत्ता में बने रहने के लिए मामा की कवायद में सब हथियार बने हुए हैं जरूरत की योजनाओं का पूर्णतः अभाव है जरूरत के कर्मचारी नहीं हैं जरूरत वाले कर्मचारियों को वेतनमान के लिए तरसाया जा रहा, आवश्यक बुनियादी स्वास्थ्य सेवा के कर्मचारियों को प्रताड़ित किया जा रहा, सुरक्षा के क्षेत्र में लापरवाही की जा रही, लेकिन वोटबैंक से प्रभावित होकर भ्रष्ट, बेईमान पंचायत सचिवों को उपकृत किया जा रहा, बेमतलब के अतिथों को फुसलाया जा रहा और लूट की योजनाएं जिनका जनमानस में कोई औचित्य नहीं उन्हें धन से मालामाल किया जा रहा।

 

झूठ से ज्यादा दिन बरगलाया नहीं जा सकता, सच फाड़कर सामने आता है।

 

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साभार – चंदन तिवारी

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