एक और बेहतरीन राजा का इतिहास ..

एक और बेहतरीन राजा का इतिहास .. सूर्यवंशी दिग्विजयी सम्राट ललितादित्य के
नेतृत्व में मध्य एशिया तक जा पहुंची थी
कश्मीर की खड्ग

विजीयते पुण्यबलैर्बर्यत्तु न शस्त्रिणम
परलोकात ततो भीतिर्यस्मिन् निवसतां परम्।।
वहां (कश्मीर) पर शस्त्रों से नहीं केवल पुण्य बल द्वारा ही विजय प्राप्त की जा सकती है। वहां के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं न कि शस्त्रधारियों से। – (कल्हणकृत राजतरंगिणी, प्रथम तरंग, श्लोक 39)

इतिहासकार कल्हण ने मां भारती के शीर्ष कश्मीर की गौरवमयी क्षात्र परंपरा और अजेयशक्ति पर गर्व किया है। विश्व में मस्तक ऊंचा करके चार हजार वर्षों तक स्वाभिमानपूर्वक स्वतंत्रता का भोग कश्मीर ने अपने बाहुबल पर किया है। इस धरती के शूरवीरों ने कभी विदेशी आक्रमणकारियों और उनके शस्त्रों के सम्मुख मस्तक नहीं झुकाए थे। इस पुण्य धरती के रणघोष सारे संसार ने सुने हैं। यहां के विश्वविजेता सेनानायकों के युद्धाभिमानों का लोहा समस्त विश्व ने माना है।
रणबांकुरों की भूमि
अनेक शताब्दियों तक इस वीरभूमि के रणबांकुरों ने विदेशों से आने वाली घोर रक्तपिपासु एवं अजेय कहलाने वाली जातियों और कबीलों के जबरदस्त हमलों को अपनी तलवारों की नोक पर रोका है। इस भूमि पर जहां अध्यात्म के ऊंचे शिखरों का निर्माण हुआ, वहीं इसके पुत्रों ने वीरभोग्या वसुंधरा जैसे क्षात्रभाव को अपने जीवन का आवश्यक अंग भी बनाया। संस्कृत के अनेक प्राचीन ग्रंथों में कश्मीर के इस वैभव के दर्शन किए जा सकते हैं।
आधुनिक इतिहासवेत्ताओं को भी एक दिन यह लिखना ही होगा कि कश्मीर ने एक ओर संसार की सुख शांति के लिए शैव दर्शन जैसे अतुलनीय सिद्धांत मानव को दिए, वहीं अत्याचार एवं अमानवीय वृत्तियों के दमन हेतु त्रिशूल दर्शन भी प्रस्तुत किया। आधुनिक इतिहास के पन्ने भी साक्षी हैं कि कश्मीरी खड्ग के वार मध्य एशिया के सुदूर क्षेत्रों तक हुए थे। कश्मीर की इस दिग्विजयी विरासत को झुठलाया नहीं जा सकता।
कश्मीर का सर्वत्र बोलबाला
एक और बेहतरीन राजा का इतिहास .. महाभारत युद्ध से प्रारंभ हुआ कश्मीर का ज्ञात इतिहास संस्कृत के राजतरंगिणी नामक महाग्रंथ में आज भी उपलब्ध है। सम्राट अशोक, शिव उपासक जालौक, मेघवाहन, दुर्लभ वर्धन, चन्द्रापीड़, ललितादित्य, अवंति वर्मन, शंकर वर्मन, संग्राम राज, त्रिलोचन पाल, जय सिंह, महारानी दिद्दा एवं कोटारसी इत्यादि सैंकड़ों राजा-महाराजा हुए हैं, जिन्होंने कश्मीर की दिग्विजयी सांस्कृतिक और मानवीय धरोहर को अक्षुण्ण बनाए रखा। आठवीं शताब्दी के सबसे शक्तिशाली भारतीय सम्राट ललितादित्य के समय कश्मीर और कश्मीरियत का बोलबाला पूरे भारत सहित आज के मध्य एशिया तक था।
ललितादित्य जब अपनी सेना के साथ पंजाब के कूच पर निकला तो पंजाब की जनता ने उसके स्वागत में पलक पांवड़े बिछा दिए। पंजाब के शासक यशोवर्मन को पदच्युत करके पंजाब को कश्मीर राज्य की सीमाओं में मिलाया गया। ललितादित्य ने अपने सैन्य अभियान से बंगाल, बिहार, उड़ीसा तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। यह सैनिक कूच गुजरात, मालवा और मेवाड़ तक सफलतापूर्वक आगे ही आगे बढ़ता गया। ललितादित्य के इन सफल युद्ध अभियानों के कारण भारत ही नहीं समूचे विश्व में कश्मीर की धरती के पराक्रमी पुत्रों का नाम यशस्वी हुआ। कश्मीरी लोगों के क्षात्र तेज के आगे बड़े-बड़े साम्राज्य नतमस्तक हुए।
दिग्विजयी कश्मीरी प्रतिभा
एक और बेहतरीन राजा का इतिहास .. सुदूर दक्षिण तक विजय प्राप्त करके सम्राट ललितादित्य अब और भी ऊंचे शिखरों को नापने के लिए लालायित हो उठे। इतिहासकार मजूमदार के शब्दों में, ‘दक्षिण की इन महत्वपूर्ण विजयों के बाद ललितादित्य ने कश्मीर की उत्तरी सीमाओं पर स्थित क्षेत्रों का ध्यान दिया। उस समय भारत से चीन तक के कारवां मार्गों को नियंत्रित करने वाली कराकोरम पर्वत श्रृंखला के सबसे अगले स्थल तक उसका साम्राज्य फैला था। उल्लेखनीय है कि आठवीं सदी के शुरू होते ही अरबों का आक्रमण काबुल घाटी को चुनौती दे रहा था। इसी दौरान सिंध के रास्ते से मुस्लिम शक्ति उत्तर की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही थी। जिस समय काबुल और गांधार का शाही साम्राज्य इन आक्रमणों में व्यस्त था, ललितादित्य के लिए उत्तर दिशा में पांव जमाने का एक सुंदर अवसर था। अपनी विजयी सेना के साथ वह दर्द देश (दर्दिस्तान) में से तुर्किस्तान (तुर्की) की ओर बढ़ा। असंख्य कश्मीरी भिक्षुओं तथा मध्य एशियाई नगरों के कश्मीरी लोगों के प्रयासों के फलस्वरूप पूरा क्षेत्र कश्मीरी परंपराओं तथा शिक्षा से समृद्ध था। अतएव यह समझना कठिन नहीं है कि ललितादित्य के मार्गदर्शन में कश्मीरी सेना ने वहां सरलता से विजय प्राप्त कर ली। टैंग शासन की समाप्ति तथा भीतरी असैनिक युद्धों आदि के कारण जिस चीनी साम्राज्य के अधीन वह आए थे वह पहले ही खंड खंड हो रहा था।’
(आर.सी.मजूमदार, एशिएंट इंडिया पृ.383)
सार्वजनिक आदर्शों की नींव
ललितादित्य ने अपने सैनिक जीवन के अतिरिक्त भी अनेक क्षेत्रों में रुचि दिखाई। उनके शासनकाल में व्यापार एवं कला को महत्व दिया गया। धार्मिक उत्सवों के आयोजन होते थे। चित्रकला, मूर्तिकला के क्षेत्रों में ललितादित्य ने विशेष प्रोत्साहन एवं सुविधाएं प्रदान कीं। ललितादित्य एक सफल लेखक और वीणावादक भी थे। इतिहासकार बामजाई लिखते हैं- ‘ललितादित्य की सैनिक विजयों को उसके विभिन्न शासनकालीन वर्णनों में महत्वपूर्ण स्थान मिला है। बाद के समय में भी उसे कश्मीरियों का हीरो बताया गया है। निर्माण कला व जनकल्याण के उसके महान कार्यों, शिक्षा के प्रति प्रेम, विद्वानों के संरक्षण और दयालु विजेता रूपी गुणों के कारण उसकी गणना कश्मीर के बड़े-बड़े शासकों में होती है।’
उस समय का भारतीय कश्मीर सार्वजनिक जीवन के प्राय: सभी क्षेत्रों में विकास का मुख्य केन्द्र था। प्रत्येक नागरिक को उन्नति के समान अवसर उपलब्ध थे। सम्राट ललितादित्य ने जहां एक ओर धर्म की स्थापना तथा संरक्षण के लिए शक्ति की उपासना की, वहीं दूसरी ओर उसने सह अस्तित्व, सत्य, अहिंसा जैसे सिद्धांतों की रक्षा के भी अनेक प्रयास किए।
सर्वश्रेष्ठ हिन्दू निर्माण कला
सम्राट ललितादित्य का अत्यंत सुंदर एवं चिरस्मरणीय कार्य है उनके द्वारा निर्मित विशाल मार्तण्ड मंदिर जिसे सम्राट ने भगवान भास्कर सूर्यदेव (आदित्य) के सम्मान में बनवाया था। उल्लेखनीय है कि सम्राट ललितादित्य स्वयं भी सूर्यवंशीय क्षत्रिय थे। मंदिर निर्माण की अतुलनीय शैली और इसे बनाने की अतुलनीय क्षमता विश्व के इतिहास में दुर्लभ है।
इतिहासकार स्टैंन कहता है ‘ललितादित्य कालीन नगरों, कस्बों तथा भग्नावशेषों को पूरे विश्वास के साथ ढूंढ निकालना संभव नहीं है। परंतु इनमें से जो जो पाए गए हैं उनके भव्य भग्नावशेषों से उस प्रसिद्धि का पता चलता है जो निर्माता के रूप में ललितादित्य को प्राप्त थी। मार्तण्ड के भव्य मंदिर के अवशेष जिसे सम्राट ने इसी नाम के तीर्थ स्थल पर बनवाया था, आज भी प्राचीन हिन्दू निर्माण कला का सबसे अनूठा उदाहरण है। अपनी वर्तमान क्षत-विक्षत अवस्था में इन भग्नावशेषों को उनके आकार-प्रकार तथा निर्माण कला संबंधी डिजाइन व सुंदरता के कारण सराहा जाता है।’
(स्टैंन ट्राशलेशल आफ राजतरंगिणी पृ.60)
सुखी सम्पन्न समाज रचना
इतिहासकार यंगहस्बैंड के अनुसार ‘विश्व के महान निर्माण कला नमूनों में मार्तण्ड का बहुत ऊंचा स्थान है। यह केवल कश्मीरी निर्माण कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण ही नहीं है, बल्कि इसे विश्व के सबसे बढ़िया स्थल पर बनने का गौरव प्राप्त है। पॉर्थीनान, ताजमहल, सेंटपीटर्स, एक्सक्यूरियल भवनों से भी उमदा स्थलों पर। हम इसे शेष सभी महान भवनों का प्रतिनिधि या इनके सभी गुणों का जोड़ मान सकते हैं। इसी से हमें कश्मीरी लोगों की सर्वश्रेष्ठता का ज्ञान हो सकता है।
‘ललितादित्य के शासनकाल में समाज बहुत सुखी एवं सम्पन्न था। एशिया के प्राय: सभी देशों के साथ खुली व्यापार व्यवस्था थी। खेती के लिए अनेक सुविधाएं थीं और अनेक नवीन खोजें की गईं। जलसंचार योजना को महत्व दिया गया। ललितादित्य ने विदेशों में अपने विजय स्मृति स्थल बनवाए। सुनिश्चितपुर और दर्पितपुर नामक दो महानगरों का वर्णन राजतरंगिणी में आता है, यद्यपि इन नगरों के खंडहर तक भी मुस्लिम हमलावरों ने समाप्त कर दिए हैं। उसने फलपुर और पर्णोत्सव नाम के भी दो नगर बसाए। फलपुर आजकल शादीपुर गांव है और पर्णोत्सव नगर आजकल का पुंछ है। ललितादित्य ने ललितपुर में जो आजकल का लेतापुर है एक बड़ा मंदिर बनवाया। हुष्कपुर में जो आजकल उशकुर है, सम्राट ने एक बड़ा विहार एवं बौद्ध मंदिर का निर्माण करवाया। कश्मीर के इतिहास में मार्तण्ड का मंदिर और परिहासपुर शहर अमर है। आजकल के शादीपुर के पास ही परिहासपुर नगर था।’ (कश्मीर, गोपीनाथ श्रीवास्तव, पृ.25)
आतंकी जिहाद की कालिमा
ललितादित्य ने विदेश के अनेक प्रतिभाशाली लोगों को कश्मीर आने का निमंत्रण दिया। विदेशी इतिहासकार अलबरूनी के लेखन से पता चलता है कि सम्राट ने एक तुर्क सरदार कान्यकुन्य को अपना मंत्री बनाया। बाद में इस सरदार ने बौद्ध मत को स्वीकार कर लिया। इसी समय से कश्मीर में एक वार्षिक उत्सव की प्रथा चली। यह विजयोत्सव सम्राट ललितादित्य की तुर्किस्तान पर हुई विजय की स्मृति में अनेक शताब्दियों तक मनाया जाता रहा। ललितादित्य के साथ कश्मीर में हिन्दू स्वाभिमान का स्वर्ण युग प्रारंभ हुआ। हिन्दू धर्म की विशालता, सहिष्णुता का प्रतीक बन गया था सम्राट ललितादित्य। इस आभा को बाद के मुस्लिम आक्रांता शासकों ने बर्बाद कर दिया।
आज मुस्लिम देशों के इशारे एवं मदद से जो कश्मीरी युवक आतंकी जिहाद का झंडा उठाकर अपने ही पूर्वजों की सर्वश्रेष्ठ धरोहर से मुंह मोड़कर इस नंदनवन को मजहबी आग में जला रहे हैं वे भारतीय संस्कृति, हिन्दुत्व, मानवीय कश्मीरियत और इस्लाम के भी कई उदारवादी उसूलों को दफन कर रहे हैं।

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