जब ताजमहल को ख़रीदा था नीलामी में एक हिन्दू वैश्य ने

दिल्ली: भारत के इतिहास में यह घटना सबसे विचित्र थी जब अंग्रेजो ने अपने निजी लाभ के लिए विश्व की सबसे सुन्दर कलाकृति को बेचने की कोशिस की थी। उस समय ताज की बोली सबसे अधिक लगाने वाले एक हिन्दू वेश्य थे। जिन्होंने ताज की नीलामी में बोली लगाकर ताज को खरीद लिया था।

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अंग्रेजों ने अपने फायदे और ताजमहल में लगे कीमती संगमरमर के पत्थरो के लिए ताजमहल की नीलामी लगायी थी। अंग्रेजो की मंशा ताजमहल तोड़कर इसके कीमती पत्थरों को ब्रिटेन लेजाने की थी। और बाकी बचे संगमरमर के पत्थरों को बेचकर वो अपना सरकारी खजाना भरना चाहते थे। यह बात वर्ष 1828 की है जब तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने कोलकाता के अखबार में टेंडर भी जारी किया था। उस समय ब्रिटिश हुकूमत की राजधानी कोलकाता हुआ करती थी।

तब अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र में 26 जुलाई, 1831 के अंक में ताजमहल को बेचने की एक विज्ञप्ति प्रकाशित की गई थी। नीलामी की शर्त अनुसार ताज को तोड़कर इसके खूबसूरत पत्थरों को अंग्रेजों को सौंपना था।

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इसकी नीलामी में कई देशी विदेशी व्यापारियों ने भाग लिया लेकिन नीलामी में सबसे अधिक बोली लगाकर ताजमहल को मथुरा के सेठ लक्ष्मीचंद ने सात लाख में खरीद लिया था। सेठ जी का परिवार आज भी मथुरा में रहता है।

सेठ लक्ष्मीचंद्र के परपोते विजय कुमार मथुरा में रहते हैं उन्होंने कहा कि सेठ लक्ष्मीचंद्र ने ताजमहल को पहले डेढ़ लाख में और बाद में बोली कैंसिल हो जाने पर दोबारा सात लाख में खरीदा था जो बाद में निरस्त हो गयी।

इस घटना की उल्लेख अंग्रेज और भारतीय लेखकों ने पुस्तकों में किया है। लेखक एच.जी.कैन्स ने ने आगरा एण्ड नाइबर हुड्स पुस्तक में और सतीश चतुर्वेदी ने आगरानामा में प्रो.रामनाथ ने द ताजमहल में इस घटना का जिक्र किया है।

प्रो.रामनाथ के अनुसार, ताज महल के पुराने सेवादारों को अंग्रेजी हुकूमत के विनाशकारी आदेश की भनक लग गई थी। यह सुचना आग की तरह फैली और लंदन तक चली गई। जिसका कई राष्ट्रों द्वारा और भारतीय नेताओ द्वारा कड़ा विरोध किया गया। साथ ही इस नीलामी में लंदन में एसेंबली में भी सवाल उठे। हर तरफ विरोध के बाद गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक को ताज महल की नीलामी रद्द करनी पड़ी।

और इस तरह से लार्ड विलियम वैंटिक की मंशा पूर्ण न हो सकी।

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