त्रिपुरा की ज्वलंत समस्या का समाधान निकालें

त्रिपुरा की ज्वलंत समस्या का समाधान निकालेंत्रिपुरा की ज्वलंत समस्या का समाधान निकालें

 

योगी ब्रह्मऋषि(संतोष राय)

राष्ट्रीय अध्यक्ष : हिन्दू महासभा-लोकतान्त्रिक

 

नई दिल्ली : मुझे अब तक यही ज्ञात था की त्रिपुरा के आदिवासी अलगाववादी हैं चूँकि त्रिपुरा में पिछले 25 वर्षों से आधिक वामपंथियों की सरकार है और  तथाकथित कुंठित वामपंथी मीडिया यही प्रचारित करता रहा की आदिवासी अलगाववाद को बढावा दे रहे हैं ! त्रिपुरा में वामपंथी सरकार जो की दावा करती है की त्रिपुरा का चहुंमुखी विकास हुआ है तो इसके उलट त्रिपुरा में मूल आदिवासियों और बंगालियों के बीच उभरे तनाव के कारण कभी भी भंयंकर स्थिति उत्पन्न हो सकती है !

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अगरतला में बीते हफ्ते इंडिजेनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के मार्च के बाद हुई हिंसा ने पुरानी दरारें फिर उबार दी हैं. ये दरारें उस तरक्की पर पानी फेर सकती हैं जो इस राज्य ने बीते एक दशक के दौरान की है ! इस हिंसा में न सिर्फ 100 से भी ज्यादा लोग घायल हो गए बल्कि इसके चलते अब राजधानी अगरतला से आदिवासी आबादी खासकर छात्रों का पलायन होने लगा है, अब डर है कि बांग्लाभाषी बहुसंख्यक आबादी की जवाबी कार्रवाई और इसकी प्रतिक्रिया में होने वाली लामबंदी फिर पुराना बैर न भड़का दे ! वह बैर जो कोक-बोरोक भाषी यहां की मूल आबादी और बाद में यहां बसे बंगाली समुदाय के बीच रहा है !

 

त्रिपुरा के आदिवासी कभी यहाँ बहुसंख्यक थे और 1971 के बांग्लादेश के युद्ध के समय आयें बंगाली हिन्दुओं को शरण देकर उनका स्वागत किया था, इसके उपरान्त बांग्लादेश से लाखों की संख्यां में अवैध बंगलादेशी मुसलमानों का भी आगमन हुआ और बंगाली हिन्दुओं और बंगाली मुसलमान त्रिपुरा में बसकर एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन गये और कम्युनिष्ट इन बांग्लादेशियों के बल पर आज तक शासन कर रहे हैं और त्रिपुरा की मूल आदिवासी जनता पिसती रही और प्रताड़ित होती रही ! त्रिपुरा में इन परिस्तिथियों का लाभ उठाकर ईसाई मिशनरियां में सक्रीय हो गई यह कहकर की उन्हें मुफ्त शिक्षा व अन्य सुविधाएँ देकर इन बंगालियों से छुटकारा दिलाया जाएगा और करीब 40% आदिवासी धर्मान्तरित होकर ईसाई बन गये ! लेकिन अभी भी त्रिपुरा के मूल आदिवासी अपनी सनातनी परम्परा को नहीं भूले हैं और वहां की देवी “त्रिपुरसुन्दरी” पर अपनी आस्था रखते हैं ! लेकिन अब यही ईसाई मिशनरियां उन्हें कहती हैं यह राजनीतिक मामला चर्च इसमें दखल नही देगा ! त्रिपुरा के आदिवासियों को ठगा गया !

 

समस्या यही है है की त्रिपुरा में विकास मात्र बांग्लादेश से आये शरणार्थियों का हुआ है लेकिन त्रिपुरा के मूल आदिवासियों के साथ सभी प्रकार से छल हुआ ! उसके लिए जिम्मेदार राज्य सरकार, तत्कालीन केंद्र सरकार और चर्च(ईसाई मिशनरी) भी हैं !

 

आईपीएफटी ने बीते हफ्ते जो मार्च आयोजित किया था उसका मकसद यह था कि एक अलग आदिवासी राज्य को लेकर दबाव बनाया जाए. संगठन चाहता है कि त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के इलाके को ही त्विपरालैंड नाम के एक नए राज्य में बदल दिया जाए. उसका आरोप है कि राज्य में आदिवासी मुख्यधारा से कटे हैं. यह बात सही है और इस समस्या का हल भी जरूरी है !

 

अगरतला में बीते हफ्ते इंडिजेनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के मार्च के बाद हुई हिंसा ने पुरानी दरारें फिर उबार दी हैं. ये दरारें उस तरक्की पर पानी फेर सकती हैं जो इस राज्य ने बीते एक दशक के दौरान की है. इस हिंसा में न सिर्फ 100 से भी ज्यादा लोग घायल हो गए बल्कि इसके चलते अब राजधानी अगरतला से आदिवासी आबादी खासकर छात्रों का पलायन होने लगा है. अब डर है कि बांग्लाभाषी बहुसंख्यक आबादी की जवाबी कार्रवाई और इसकी प्रतिक्रिया में होने वाली लामबंदी फिर पुराना बैर न भड़का दे. वह बैर जो कोकबोरोकभाषी यहां की मूल आबादी और बाद में यहां बसे बंगाली समुदाय के बीच रहा है !

 

आईपीएफटी ने बीते हफ्ते जो मार्च आयोजित किया था उसका मकसद यह था कि एक अलग आदिवासी राज्य को लेकर दबाव बनाया जाए. संगठन चाहता है कि त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के इलाके को ही त्विपरालैंड नाम के एक नए राज्य में बदल दिया जाए. उसका आरोप है कि राज्य में आदिवासी मुख्यधारा से कटे हैं. यह बात सही है और इस समस्या का हल भी जरूरी है लेकिन अलगाववादी राजनीति करके नया राज्य बनाना न तो व्यावहारिक है और न ठीक !

 

त्रिपुरा एक रियासत थी और 20वीं सदी की शुरुआत तक आदिवासी इसमें बहुसंख्यक थे. लेकिन आज वे राज्य की आबादी का महज एक तिहाई हैं !जनसांख्यिकी में यह बदलाव आजादी से पहले के दौर में हुआ जब यहां जंगलों को काटकर खेती को प्रोत्साहन दिया गया. बंटवारे और बांग्लादेश युद्ध ने बंगालियों के यहां बसने की प्रक्रिया को तेज किया, राज्य बनने के बाद से त्रिपुरा की नीतियां ज्यादातर शहरों पर केंद्रित रहीं. यह असंतुलन और इस पर आदिवासियों का असंतोष आजादी के पहले भी दिखता था लेकिन 1972 में राज्य बन जाने के बाद भी त्रिपुरा इस मसले को सुलझाने में विफल रहा. नतीजा यह हुआ कि 1990 में यहां उग्रवाद ने पांव पसार लिए और हथियारबंद संगठन अलग राज्य मांगने लगे ! इसके बाद राजनीति, विकेंद्रीकरण और पुलिस और सेना के सहयोग से उग्रवाद पर काबू कर लिया गया !

 

हमें आदिवासियों की शिकायतों पर ध्यान देकर सुनना भी होगा और उसका समाधान भी करना होगा ! आदिवासी इलाकों में बुनियादी ढांचा मजबूत करना चाहिए और आदिवासियों की भागीदारी को ज्यादा करना चाहिए तथा जो वैध रूप से बांग्लादेश से आकर त्रिपुरा में बस गये हैं उन्हें तत्काल प्रभाव से भगाना चाहिए !

 

हिन्दू महासभा दिनांक 3 नवम्बर 2017 से 5 नवम्बर 2017 तक त्रिपुराके आदिवासी क्षेत्रों में सम्मलेन एव सभा कर त्रिपुरा के आदिवासियों को न्याय दिलाएगी !

 

जय माँ त्रिपुरसुंदरी

जय भवानी

 

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