जब लेनिन लन्दन में मिले थे वीर सावरकर के साथ, दोनों नेता थे एक दुसरे से प्रभावित

त्रिपुरा में 25 साल के कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ फेंकने के जोश में कई लोग लेनिन की मूर्तियां तोड़ने में लग गए हैं. कई दक्ष‍िणपंथी नेता तो इसे वाजिब ठहराते हुए इसके लिए तर्क भी गढ़ने लगे हैं. लेकिन ऐसे लोग यह जानकर चकित हो सकते हैं कि उनके लिए हिंदुत्व के प्रतीक पुरुष वीर सावरकर खुद साम्यवादी क्रांति के अगुआ व्लादीमीर लेनिन से लंदन में मिले थे, लेकिन वही वामपंथियों कि दोहरी सोच भी सामने आती है क्यूंकि एक ओर हिंदुत्व के पुरोधा और हिन्दू महासभा के बड़े नेताओं में से एक सावरकर से खुद लेनिन इतने प्रभावित थे कि वे सावरकर से मिलने लन्दन आये थे

जब लेनिन लन्दन में मिले थे वीर सावरकर के साथ, दोनों नेता थे एक दुसरे से प्रभावित

कारण सुनकर आप भी चौंक जायेंगे, असल में वीर सावरकर ने एक क्रांतिकारी संगठन बनाया था जो लन्दन के इंडिया हाउस से चलता था, और इस इंडिया हाउस से ही भारत के सभी क्रांतिकारियों को न केवल हथियार और बम मिलते थे बल्कि लन्दन में आने वाले भारतीय क्रांतिकारियों का यही इंडिया हाउस एकमात्र निवास स्थल भी था,

बीसवी सदी में लन्दन में बना इंडिया हाउस लन्दन में बसे भारत के क्रांतिकारियों की गतिविधियों का मुख्य केंद्र था, इसे तब के क्रन्तिकारी नेता श्यामजी कृष्ण वर्मा ने बनवाया था जो उस समय क्रांतिकारियों के सबसे बड़े नेताओं में से एक माने जाते थे उनके इस इंडिया हाउस में न केवल वीर सावरकर बल्कि मैडम भीखाजी से लेकर लाला लाजपत राय, मदन लाल धींगरा जैसे बड़े क्रांतिकारी भी आये थे जिस कारण यह इंडिया हाउस भारतीय क्रांतिकारियों कि गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था जहाँ से भारत में हथियार और बम के मैन्युअल गुप्त तरीके से सप्लाई किये जाते थे ताकि क्रांतिकारी गतिविधियों को भारत में बढ़ावा मिले और इस काम में उनके सबसे बड़े सहयोगी थे लेनिन

वीर सावरकर के बनाए इस संगठन अभिनव भारत ने 1909 में अपने एक क्रांतिकारी सेनापति बापट को रूस भेजा, बापट रूस में लेनिन और उनके साम्यवादी कार्यकर्ताओं से मिले जहाँ से उन्हें बम बनाने का मैन्युअल और कई आधुनिक हथियारों कि जानकारी मिली, इसी जानकारी को उन्होंने भारत भेजा जिसे उस समय के कई बड़े क्रांतिकारियों जैसे जतिन बाघा ने अपनाया और अंग्रेजो के विरुद्ध प्रयोग किया, वीर सावरकर की क्रांतिकारी गतिविधियों से लेनिन इतने प्रभावित हुए थे कि वे खुद उनसे इलने रूस से लन्दन पहुंचे थे लेकिन राजनीति दो मित्रो को भी शत्रु बना देती है

यह हर कोई जानता है कि महात्मा गांधी की विचारधारा को सावरकर पसंद नहीं करते थे. उन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम के विचार का विरोध किया था. इस मामले में सावरकर लेनिन जैसे क्रांतिकारियों को ज्यादा व्यावहारिक मानते थे. जब साल 1906 में वीर सावरकर कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए थे. उन्होंने तीन साल तक इंडिया हाउस में रह कर पढ़ाई की. वीर सावरकर न केवल एक क्रन्तिकारी एक प्रखर वक्ता और विचारक भी थे जिसकी वजह से जल्दी ही लंदन में रहने वाले भारतीयों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए.

मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जनी को सरेआम गोली मारने के बाद जिस चालाकी से सावरकर ने धींगरा का ब्यान सार्वजानिक किया था उससे भारतीय उन्हें अपना अगला नेता मानने लगे थे, यही कारण था कि जब वीर सावरकर को कालेपानी कि सजा दी गयी तो उन्होंने युक्ति लगाते हुए जेल में रहने कि जगह अंग्रेज सरकार से माफ़ी कि गुहार लगे ताकि वे बाहर निकल कर गुप्त तरीके से अपनी गतिविधियों को जारी रख सके, उनकी इसी चालको को भांप कर तब के अंदमान के जेलर ने ब्रिटिश सरकार से विनती कि थी कि सावरकर कि माफ़ी एक ढोंग है इसलिए उन पर यकीन न किया जाए,

सावरकर जेल में जितने खतरनाक है उससे अधिक खूंखार वे जेल के बाहर है इसलिए उन्हें सरकार रिहा न करे और उनकी माफ़ी कि अर्जी को ठुकरा दे, चूँकि उनके भाई द्वारा डाली गयी अर्जी पर ब्रिटिश सरकार ने संज्ञान लेते हुए सावरकर को यरवदा जेल भेज दिया था और 1927 में उहे घर पर ही नजरबन्द कर दिया गया था लेकिन तब भी कई अंग्रेज अधिकारियों ने सरकार द्वारा उन्हें नजरबन्द करने कि घटना का विरोध किया था उनेक अनुसार सावरकर घर पर रह कर भी कई तरह कि क्रांतिकारी गतिविधियों को गुप्त तरीके से अंजाम देते हैं

इंडिया हाउस में अक्सर दूसरे देशों जैसे रूस, आयरलैंड, टर्की, मिस्र, ईरान और चीन जैसे देशों के क्रांतिकारी नेता आते थे. सावरकर के एक ब्रिटिश मित्र थे जी. अल्फ्रेड जिनका संपर्क रूसी क्रांति के नायक लेनिन से था. लेनिन की ख्याति उन दिनों रूस से लेकर यूरोप तक पहुंच गई थी. खुद वीर सावरकर के जीवन पर आधारित वेबसाइट के अनुसार अल्फ्रेड 1909 में लेनिन को वीर सावरकर से मिलाने के लिए इंडिया हाउस लेकर गए थे. बताया जाता है कि लेनिन चार बार इंडिया हाउस गए थे ये सावरकर कि छवि ही थी जिससे न केवल भारतीय बल्कि लेनिन भी उनके मुरीद बन गए थे

लेकिन वामपंथी नेताओं ने सदैव ही अपने सर्वेसर्वा लेनिन कि विचारधारा के बिलकुल अलग वीर सावरकर का विरोध किया, वामपंथी नेताओं ने वीर सावरकर को हमेशा गालियाँ दी और उनकी गतिविधियों पर ऊँगली उठाई यहाँ तक कि उन्होंने सावरकर द्वारा अंग्रेज सरकार से माफ़ी वाली बात को भी रणनीति न बता कर सावरकर कि कायरता बताया, जबकि घर में नजरबन्द रहते हुए भी सावरकर ने न केवल अपनी गतिविधियाँ बढाई बल्कि उस समय उन्होंने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को अपने घर भी बुलाया और चोरी छुपे उन्हें रूस होते हुए जर्मनी भी भेजा था

ये सावरकर ही थे जिन्होंने नेताजी बोस को रास बिहारी से मिलकर आजाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व करने का सुझाव दिया, ये सावरकर ही थे जिनके कारण हिटलर जैसा बड़ा नेता उनके कहने पर नेताजी बोस से मिला और उनको सहायता का आश्वासन दिया, सावरकर के कारण ही जापान ने ब्रिटिश सरकार के युद्धबंदी भारतीयों को मिलाकर आजाद हिन्द फ़ौज बनाई

लेकिन वर्तमान में राजनीति का शिकार न केवल लेनिन हुए है बल्कि वीर सावरकर भी हुए है जहाँ एक ओर वीर सावरकर को अपना आदर्श मानने वाले बीजेपी आज लेनिन कि मूर्तियाँ गिरा रही है तो वही वामपंथियों के वैचारिक गुरु लेनिन जिन वीर सावरकर के मुरीद थे, उन्ही वीर सावरकर को आज वामपंथी बुरा भला कहने से नहीं चुकते, राजनीति दोनों ओर है वोट कि राजनीति बीजेपी और वामपंथी दोनों खेल रहे है पर अपने आदर्शो के विचारो पर चलने वाला कोई नहीं है

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लेखक: रोहित कुमार

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