150 सालो से इस अद्भुत मंदिर का पहरेदार है चमत्कारी शाकाहारी मगरमच्छ

150 सालो से इस अद्भुत मंदिर का पहरेदार है चमत्कारी शाकाहारी मगरमच्छ150 सालो से इस अद्भुत मंदिर का पहरेदार है चमत्कारी शाकाहारी मगरमच्छ

कुछ बातों पर विश्वास करना सम्भव नही है, लेकिन भारत में अनेक ऐसे धार्मिक स्थान है जहाँ ये असम्भव बातें भी सम्भव दिखती हैं. पौराणिक किस्से-कहानियों में आपने जरूर सुना होगा, किसी विशेष स्थल या फिर खज़ाने की रक्षा के लिए द्वार पर रक्षक विराजमान होते थे. कई बार यह रक्षक खूंखार जानवर भी होते थे, लेकिन यह केवल उन्हें हानि पहुंचाते थे जो उस स्थल को नष्ट करने या नुकसान पहुंचाने के मकसद से आता था.

लेकिन आज इसी कहानियों की तरह हम आपको एक और कहानी सुनाएंगे. यह आज के युग की कहानी है, जो मात्र एक किताबी कहानी ना होकर, एक मंदिर की सच्चाई बन चुकी है. एक ऐसा मंदिर हैं जहां कितने ही वर्षों से एक मगरमच्छ है, यह मगरमच्छ उस मंदिर की रक्षा करता है.

वो भी शाकाहारी मगरमच्छ? मगरमच्छ जिसकी प्रकृति ही मांसाहारी होती है. पर आप यकीन करें या न करें, यह पूर्णतः सत्य है कि केरल के एक मंदिर में शाकाहारी मगरमच्छ रहता है.

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“बाबिया” नाम से जानते है सभी:- मगरमच्छ आया कब.

यह मगरमच्छ कहां से आया, इस झील में कब आया, यह कोई नहीं जानता. लेकिन लोगों का कहना है कि नौवीं शताब्दी में मंदिर के निर्माण के बाद ही, यहां झील में अचानक एक मगरमच्छ आ गया. लोगों का कहना है कि तब से लेकर अब तक इस झील में कई मगरमच्छ मरे भी, लेकिन अचंभा तब होता है जब एक मगरमच्छ मरने के बाद अपने आप ही दूसरा मगरमच्छ झील में आ जाता है.

“बबिया” नामक यह मगरमच्छ कोच्चि जिले के अनंतपुरा मंदिर की झील में रहता है. मंदिर के लोग बताते हैं कि बाबिया यहां काफी वर्षों से रह रहा है. उसका निवास झील और पास ही बनी गुफाएं हैं.

ऐसा माना जाता है कि यह सम्मानित प्राणी “बाबिया” मंदिर का रक्षक है. ऐसा भी कहा जाता है कि जब मगर की मृत्यु होती है तो आश्चर्यजनक रहस्यमयी रूप से कोई दूसरा मगरमच्छ उसका स्थान ले लेता है.

अनंतपुरा मंदिर केरल में केवल एक ही झील या तालाब वाला मंदिर है. लोक कथाओं के अनुसार इस स्थान को अनंत पद्मनाभ स्वामी का मूल आसन या मूल स्थान माना जाता है. यह मंदिर बेकल से 30 किमी दूर स्थित है. इस मंदिर की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि जाति, जातीयता और धर्म की परवाह किए बिना यहाँ कोई भी जा सकता है.

मगरमछ केवल मंदिर में चढ़ाया हुआ चावल, नारियल, गुड़ आदि का प्रसाद खाता है.

अनंतपुरा मंदिर एक पहाड़ी की तलहटी में बने तालाब में बना हुआ है. यहां का वातावरण शांत होने के साथ-साथ सुरम्य भी है. मंदिर की रक्षा का जिम्मा जिस मगरमच्छ बाबिया पर है वह एकदम शाकाहारी बताया जाता है. मंदिर के ट्रस्टी रामचंद भट्ट कहते हैं कि वह सिर्फ दोपहर में भोजन करता है. उसे लोगों द्वारा चढ़ाए गए चावल, नारियल, गुड़ आदि का प्रसाद खिलाया जाता है जिसे वह बड़े चाव से खाता है. बाबिया कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता, यहां तक कि तालाब में तैर रही मछलियां भी उससे बेखौफ रहती हैं.

अनंतपुरा मंदिर में एक चुत्ताम्बलम है (मुख्य मंदिर के चारों ओर निर्मित बरामदा). मंदिर की झील, जिसमें यह पवित्र स्थल स्थित है, एक बड़ी इमारत के अंदर है. इसका माप लगभग 302 स्क्वायर फीट है जो लगभग 2 एकड़ के बराबर होता है.

इस मंदिर की सबसे अच्छी बात यह है कि यहां किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का इंसान आ सकता है. दक्षिण भारत में बने अन्य मंदिरों की तुलना में, जहां गैर-हिन्दुओं का प्रवेश सम्पूर्ण रूप से निषेध है, वहीं दूसरी ओर अनंतपुरा मंदिर में कोई भी जा सकता है.

मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद यदि भक्तों की सबसे बड़ी रुचि किसी चीज़ में होती है, तो वह है बाबिया मगरमच्छ. मंदिर ट्रस्ट के लोग बताते हैं कि लोग दूर-दूर से बाबिया मगरमच्छ के दर्शन करने आते हैं. क्योंकि यह मगरमच्छ एक जानवर ना होकर, उनकी आस्था का प्रतीक है.

“बाबिया” प्राकृतिक आपदा से पहले मंदिर वालों को सचेत कर देता है.

जी हां… जानकर आपको जरूर ही अचंभा हुआ होगा, लेकिन यह खतरनाक मगरमच्छ सच में इस मंदिर की रक्षा करता है. यह ना यहां आए भक्तों को कोई नुकसान पहुंचाता है और ना ही उन्हें डराता है. यह केवल मंदिर में आने वाले संकट की सूचना देता है.

मंदिर के ट्रस्टी बाबिया को भगवान का संदेशवाहक मानते हैं क्योंकि वह आश्चर्यजनक रूप से किसी भी प्राकृतिक आपदा आदि से पहले मंदिर वालों को सचेत कर देता है. बाबिया मंदिर की रखवाली भी पूरी जिम्मेदारी के साथ निर्वाहन करता है. मंदिर के ट्रस्टी बाबिया को श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं.

मंदिर के ट्रस्टियों के अनुसार “ एक बार भगवान विष्णु के परम भक्त श्रीविल्वामंगलुथू मगन होकर भजन गायन कर रहे थे तो उन्हें बालरूपी कृष्ण बार-बार तंग कर रहे थे, जिसके कारण वे तालाब में गिर गए. माना जाता है की तभी से इस झील में मगरमछ की उत्पति हुई जो आज तक चली आ रही है.

लोग कहते हैं कि यह बाबिया मगरमच्छ कोई और नहीं बल्कि विष्णु भक्त श्रीविल्वामंगलुथू ही हैं. इसलिए लोगों के मन में बाबिया के प्रति भक्ति भावना होती है. किंतु यह कहानी कितनी सत्य है, इसका कोई प्रमाण नहीं है. पर यह “बाबिया” मगरमच्छ शाकाहारी है यह सत्य है.

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