आखिर कब तक ?? मप्र भाग  2

आखिर कब तक ?? मप्र भाग  2

झूठ से ज्यादा दिन बरगलाया नहीं जा सकता, सच फाड़कर सामने आता है।

आजकल मप्र हड़ताली राज्य बनकर उभरा है कोई भी ऐसा विभाग ना हो जहाँ असंतोष ना हो।विगत 3,4 वर्षों से अपनी न्यायपूर्ण  मांगे लेकर कर्मचारी कई चेतावनी देते हुए हड़ताल करते आए हैं। लेकिन सरकार ने ना कोई समीक्षा की हर बार आश्वासन और वादा कर के बरगलाते रहे। इसलिए दिनांक 19 फरवरी 2018 से कर्मचारी एकबार फिर आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए हड़ताल में है।

 

संपूर्ण भारत के राज्यों में कुल जितनी योजनाएं चल रही होगीं , उसके अकेले दोगुनी योजनाएं मप्र मे लागू हैं लेकिन दुर्भाग्य ये की इन योजनाओं में आमजनता का कोई सरोकार नहीं वह मात्र फर्जी और मनगढ़ंत हैं जो कि केवल नेताओं और अधिकारियों को फायदा पंहुचाने के मकसद से तैयार की गई। अब ऐसी ही ऊल जूलूल योजनाओं में बेरोजगारी से बदहाल राज्य के नवयुवक और नवयुवतियों का भविष्य चौपट हो रहा चूकिं इन योजनाओं का एकमात्र उद्देश्य सरकार का यह दिखाना था कि हमने आपको रोजगार दिया अब आप हमें वोट दो, सरकार भी ज्यादा शोरगुल मचने पर बच्चों के ठगने जैसे 100,150 रु बढाती रही लेकिन अब जरूरत के हिसाब से जब जीना दुश्वार हुआ तो लोगों का आक्रोश फूट पड़ा और मप्र बना भारत का सबसे बड़ा हड़ताली राज्य।

 

आज स्थिति ये है कि मप्र में चुनावी बेला के निकट आने की आहट मात्र से कई वर्षों का शोषण दावानल बन चुका है सरकार का हाथ पैर फूला हुआ है और वह असमंजस की स्थिति में आमजनों का भी ख्याल छोड़कर चुनावी वोट के हिसाब से आकलन करने में जुटी है।

 

सबसे बड़ी मुश्किल सरकार के लिए वर्षों से लगे संविदा कर्मचारी हैं जिनका सिर्फ उत्पीड़न , शोषण, अपमान हुआ। ऐसे कर्मचारी स्वास्थ्य, बिजली और विभिन्न कार्यालयों में भर्ती किये गये।

 

मात्र एक , दो वर्ष के लिए भर्ती किये जाने वाले अतिथि शिक्षक ब्यापम की कार्यप्रणाली के चलते कई सालों से अतिथि ही रह गये फलतः इसके बाद विद्यालयों में जरुरत के आधार पर अतिथि शिक्षक लिए गये लेकिन स्थायी भर्ती नहीं की गई। जिन योजनाओं का कोई औचित्य नहीं , जनता को सिर्फ बताने और बरगलाने के लिए भर्ती की गई वह कर्मचारी भी अब हुंकार भरने लगे और शासन से मोलभाव करने लग गये। आखिर वर्षों तक मलाई जो चखी है ,तो अब धन भी तो लपक के मिलना चाहिए।

 

इन सब से इतर अगर देखें तो जिनकी सबसे ज्यादा जरूरत है , जो आवश्यक बुनियादी आवश्यकता है उसकी घोर उपेक्षा की गई जैसे स्वास्थ्य , शिक्षा और सुरक्षा।

 

सन  2005 में स्वास्थ्य क्षेत्र में पिछड़ेपन को देखते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की शुरूआत की जिसका क्रियान्वयन मप्र को मानवीय स्तर और स्वास्थ्यगत बहुत लाभ मिला। लगभग 3 दशकों से जिन पदों की सरकार स्वास्थ्य विभाग में भर्ती करना भूल गई थी उसकी भरपाई की गई और शिक्षित, स्वपेशे के विद्वान और मर्मग्यों को सेवा करने का सुअवसर मिला और मप्र स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्थक प्रगति किया।

 

जबकि पहले स्वास्थ्य विभाग में जिले भर में केवल एक ,2 फार्मासिस्ट और 5’6 लैब टैक्नीशियन ही होते थे जिससे अप्रशिक्षित और अशिक्षित लोग काम चलाते थे। लेकिन सरकार 5’6 वर्ष विभाग में महती भूमिका निभाने के वावजूद शोषण ही करती आई और डरा धमकाने का खेल करती है हर वर्ष विद्वानों को छलने के लिए अप्रेजल के नाम पर लिखित एक वर्ष का राजीनामा तैयार कराती रही जबकि फार्मेसी एक्ट 1948 के अनुसार दवा का वितरण केवल मात्र केवल फार्मासिस्ट ही कर सकता है लेकिन सरकार केन्द्र की योजना बताकर तपे हुए लोगों के भविष्य के साथ खेलवाड़ ही करती आई। आज परिस्थिति ऐसी बनी कि तमाम महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चाहे वह नर्स हों या फार्मासिस्ट , लैब टेक्नीशियन , डाटाइन्ट्री आपरेटर और बीपीएम, बीसीएम सब हड़ताल में हैं जिससे सरकार में हड़कंप और आमजनता के जीवन में भय का माहौल निर्मित हो गया है।

 

अगर सरकार अब भी नहीं चेती और महत्वपूर्ण, जरूरत के कर्मचारियों का भविष्य तथा जनता की परेशानियों से सरोकार रखनेवाले विभाग , पदों का शासकीय सेवा में संविलियन नहीं किया तो हालात और बेकाबू तथा भयावह हो सकते हैं।

 

जहाँ तक हम समझते हैं सरकार को स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा से कोई समझौता ना करते हुए तत्काल स्थायी करने की घोषणा, संविलियन और जरूरती मदों का अविलंब कार्यवाही करना चाहिए।

 

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साभार – चंदन तिवारी

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